• रवि उपाध्याय
दुनियां में अलग अलग तरह के सैकड़ों त्योहार मनाए जाते हैं,लेकिन यदि सबसे ज्यादा रंगीन त्योहार यदि कोई है तो वह कोई और नहीं केवल और केवल होली है। यह त्योहारों की रानी है। यह अकेला एक ऐसा त्योहार है जिसमें बुरा न मानने की रिक्वेस्ट की जाती है। यह चेतावनी रूपी रिक्वेस्ट फेस्टिवल को और भी स्पेशल बनाती है। इसके अलावा दुनिया में कोई ऐसा त्योहार नहीं है जिसमें बुरा न मानने की बात कही गई हो।
होली का त्योहार जब आता है तो मौसम में अजीब सी रूमानियत और रंगियत छा जाती है। बाग- बगीचे चहक और महक उठते हैं।दशकों से यही हालत हैं। इसका सबूत है 1951 में आई राजकपूर की फिल्म आवारा। इसमें एक गाना है एक दो तीन आ जा मौसम है रंगीन - आ जा मौसम है रंगीन। इसी तरह 1959 में आई फिल्म नवरंग का गाना है जिसके बोल हैं अरे जारे हट नटखट छेड़ न मेरा घूंघट पलट के दूंगी आज तुझे गाली रे... मुझे समझो न तुम भोली भाली रे..सर र र रा। आशय यह कि इस त्यौहार में हुरियारे नटखट हो कर छेड़ छाड़ कर बैठते हैं। थोड़ी बहुत गाली गलोच भी चलतीं हैं।
इसमें बुरा मानने की कोई बात भी नहीं है। अब तो ठेठ देशी भाषा में बोला जाने वाला यह अलंकरण न्यूज़ चैनल्स की डिबेट, सियासत और संसद में आम सा हो गया है। ओटीटी पर तो यह अलंकरण खुल्लम खुल्ला होता ही रहता है। यह इस बात का द्योतक है कि हम तेजी से ऑर्गेनिक सभ्यता की ओर बढ़ रहे हैं। हमारी यह स्पीड एक न एक दिन हमें दुनिया में नम्बर 1 गालीबाज बना कर ही रहेगी। इसमें सब दलों के नेताओं का योगदान अविस्मरणीय रहेगा। फिर चाहे वे रहीम के मानने वाले हो या राम के अनुयायी ही क्यों न हों। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का यह दिगंबर और उच्छृंखल रूप कहा जा सकता है।
विदेशों में भी होली जैसा त्योहार अलग अलग नाम से मनाए जाते हैं। लेकिन इनमें भी मूल तत्व पानी और रंग ही होते हैं। हमारे देश में लठमार होली भी मनाई जाती है तो वहीं फूलों से भी होली खेली जाती है। इसके इतर कहीं कहीं कपड़ा फाड़ होली भी होती है। परंतु हमारे देश में होली कहीं भी खेली जाती हो एक बात सभी जगह ज़ोरशोर से बोली जाती है - बुरा न मानो होली है।
होली की त्योहार की यह खासियत है कि इसमें पुरूष हों या महिलाएं सब एक से रंग में रंग जाते हैं। उनके चेहरे रंग गुलाल से ऐसे रंग जाते हैं कि उनकी पहचान गुम हो जाती है और सब एक जैसे लगने लग जाते हैं। इस त्योहार में सब रंगे रंगाए नजर आते हैं।
बचपन में यह त्योहार आने के साथ ही घर से बाहर कदम रखने के पहले ही मदर फादर की तरफ से हिदायतें मिलने लगतीं थीं। होली खेलने जाने से पहले चेहरे पर तेल या वेसलीन पोत लेना। गुलाल से होली खेलना। मुंह पर काला वाला तेल न तो किसी को लगाना न ही किसी को अपने मुंह पर लगाने देना। गंदे दोस्तों के साथ होली मत खेलना। ठंडाई मत पीना उसमें भांग मिली होती है। कहीं भी भजिए पकोड़े मत खाना उनमें भी भांग मिली होती है। कपड़ा फाड़ होली मत खेलना। पुराने कपड़े पहन कर घर से निकलना। और हां दोपहर 12 बजे तक घर लौट आना चाहिए, और हां बेटा लिमिट में रह कर होली खेलना। बाप रे बाप इतनी हिदायतें तो जेलर भी अपने कैदियों को नहीं देते होंगे और न ही सरहद पर जाने वाले सैनिक को ऐसी हिदायतें दी जातीं होंगी ।
यही एक त्योहार होता था जिसमें नन्हें मुन्नों को इतनी हिदायतों के साथ समर क्षेत्र में उतरा जाता था। ऐसा कोई और त्योहार नहीं था जिसमें इतनी सारी हिदायतें दी जातीं रही हों। अब जमाना बदल गया है। अब काल चक्र घूम गया है। बेटों को अब पापा जी से परमिशन की जरूरत नहीं पड़ती है। अब पापा जी रिक्वेस्ट करते हैं बेटा टाइम से लौट आना साथ में खाना खाएंगे। जवाब मिलता है पापा जी आप हमारा वेट मत करना हम अपने हिसाब से आ जाएंगे। पापा आप घर पर ही रहना, कहीं मत जाना होली के हुड़दंग में गिरगिरा गए तो मुश्किल होगा।
सही बात तो यह है कि होली और रंगों का असली मज़ा तो बचपन और जवानी तक ही होता है। इसके बाद तो बस मजबूरन गुलाल की होली ही होती है। इसे सोफेस्टिकेटेड होली कहा जाता है । ऐसी होली बड़े बड़े उद्योगपति, अफसर और नेता लोग इस तरह की होली खेलते हैं। यह लोग अपने से कमतर लोगों वही गुलाल लगा कर उपकृत करते हैं जो वे अपने साथ लेकर आते हैं। जब इनके लेबल को कोई आता है तब ही वे आपस में गुलाल लगा कर गले मिलते हैं। सपोर्टरों का यह सुख नहीं है वे तो नेता जी के चरण स्पर्श कर अपना जीवन धन्य समझते हैं। जनता तो बस रंग बरसे भीगे चुनर वारी रंग बरसे गा मना कर खुश हो जाती है।

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