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जनजाति से होने मात्र से तलाक पर रोक नहीं, ठोस परंपरा साबित करना जरूरी: राजस्थान हाईकोर्टBeing a member of a tribe does not automatically bar divorce; proving a concrete custom is mandatory: Rajasthan High Court



राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल अनुसूचित जनजाति से संबंध होने के आधार पर हिंदू विवाह अधिनियम (Hindu Marriage Act) के तहत तलाक की कार्यवाही को रोका नहीं जा सकता। इसके लिए यह साबित करना आवश्यक है कि संबंधित समुदाय में विवाह और तलाक के लिए अलग मान्य परंपराएं मौजूद हैं। जस्टिस सुदेश बंसल और जस्टिस अनिल कुमार उपमन की खंडपीठ ने यह टिप्पणी करते हुए पत्नी की अपील खारिज की। पत्नी ने निचली अदालत के उस आदेश को चुनौती दी, जिसमें उसका आवेदन खारिज कर दिया गया था। उसने यह दलील दी थी कि दोनों पक्ष मीणा समुदाय से हैं, जो अनुसूचित जनजाति में आता है, इसलिए हिंदू विवाह अधिनियम लागू नहीं होता।


अदालत ने पाया कि पत्नी ने अपने आवेदन में केवल यह कहा कि विवाह मीणा समुदाय की परंपराओं के अनुसार हुआ लेकिन उसने यह स्पष्ट नहीं किया कि ये परंपराएं हिंदू रीति-रिवाजों से किस तरह अलग हैं। न ही यह बताया गया कि समुदाय में विवाह और तलाक की कोई विशिष्ट प्रक्रिया है जो हिंदू विवाह अधिनियम से भिन्न हो। हाईकोर्ट ने कहा कि पत्नी की ओर से परंपरा का हवाला अस्पष्ट और बिना ठोस विवरण के है, जिससे यह साबित नहीं होता कि हिंदू विवाह अधिनियम लागू नहीं होगा।

अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि पत्नी ने स्वयं स्वीकार किया कि विवाह हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार संपन्न हुआ था। इतना ही नहीं, उसने पहले हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 9 के तहत दांपत्य अधिकार बहाली के लिए भी याचिका दायर की थी। इन तथ्यों के आधार पर अदालत ने माना कि फैमिली कोर्ट का आदेश सही था और पति द्वारा दाखिल तलाक याचिका पर रोक लगाने का कोई आधार नहीं है। अंततः हाईकोर्ट ने पत्नी की अपील खारिज की और स्पष्ट किया कि बिना ठोस साक्ष्य के केवल समुदाय का हवाला देकर कानून की लागू होने की प्रक्रिया को नहीं रोका जा सकता।

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