सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल इस आधार पर कि किसी सिविल वाद में जबरदस्ती (coercion), अनुचित प्रभार या मिथ्या प्रस्तुतीकरण (misrepresentation) का आरोप लगाया गया है, उसे सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश VII नियम 11 के तहत प्रारंभिक चरण में खारिज नहीं किया जा सकता।
जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ ने मद्रास हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट के उन समवर्ती निष्कर्षों को रद्द कर दिया, जिनमें अपीलकर्ता के सिविल वाद को यह कहते हुए खारिज कर दिया गया था कि यह कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है। वाद में आरोप था कि अचल संपत्ति का बंटवारा जबरदस्ती, अनुचित प्रभाव और मिथ्या प्रस्तुतीकरण के आधार पर असमान रूप से किया गया।
खंडपीठ ने कहा:
“जबरदस्ती, अनुचित प्रभाव और विशेष रूप से मिथ्या प्रस्तुतीकरण के आधार, जिनके परिणामस्वरूप असमान बंटवारा हुआ, उन्हें आदेश VII नियम 11 के आवेदन पर विचार करते समय एकदम से खारिज नहीं किया जा सकता।”
क्या है विवाद?
विवाद 308 पृष्ठों के एक बंटवारा विलेख (Partition Deed) से जुड़ा है, जिस पर सभी पक्षों के हस्ताक्षर स्वीकार किए गए हैं। प्रतिवादी-वैikunदरजन समूह इसे बाध्यकारी समझौता मानकर लागू कराना चाहता है, जबकि अपीलकर्ता-जेगथीसन समूह का दावा है कि यह दस्तावेज जबरदस्ती, अनुचित प्रभाव और मिथ्या प्रस्तुतीकरण के तहत हस्ताक्षरित कराया गया था और यह केवल एक “अस्थायी मसौदा” था।
मामला 2 जनवरी 2019 के एक सुलह (Conciliation) अवॉर्ड से और जटिल हो गया, जो कथित तौर पर मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 के तहत जारी किया गया था। इसे एक सौतेले भाई ने सुलहकर्ता के रूप में हस्ताक्षरित किया था। प्रतिवादी का तर्क है कि यह दस्तावेज धारा 36 के तहत प्रवर्तनीय सुलह अवॉर्ड है। वहीं अपीलकर्ता का कहना है कि वास्तविक सुलह प्रक्रिया हुई ही नहीं और अवॉर्ड को असमान समझौते को वैध ठहराने के लिए गढ़ा गया।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
ट्रायल कोर्ट ने आदेश VII नियम 11 CPC के तहत वाद खारिज कर दिया था, जिसे हाईकोर्ट ने भी बरकरार रखा।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अपीलकर्ताओं ने वाद में ऐसे मुद्दे उठाए हैं जिन पर विधिवत सुनवाई (trial) की आवश्यकता है, विशेषकर बंटवारा विलेख और सुलह अवॉर्ड की वैधता को लेकर।
जस्टिस चंद्रन द्वारा लिखित निर्णय में कहा गया कि ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट ने प्रारंभिक स्तर पर वाद खारिज कर गंभीर विधिक त्रुटि की।
अदालत ने कहा:
“हम पाते हैं कि ट्रायल कोर्ट का आदेश, जिसे हाईकोर्ट ने पुष्ट किया, विधि की दृष्टि से गंभीर रूप से त्रुटिपूर्ण है। वाद में प्रथम दृष्टया कारण-ए-कार्रवाई (prima facie cause of action) प्रकट होता है। इसे न तो निरर्थक कहा जा सकता है और न ही प्रक्रिया का दुरुपयोग। वाद के तथ्य, कानूनी आधार और मांगी गई राहत इस स्तर पर अर्थहीन नहीं हैं और यह नहीं कहा जा सकता कि वाद अनिवार्य रूप से विफल होगा।”
इस प्रकार सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि वाद में वास्तविक और परीक्षण योग्य मुद्दे उठाए गए हों, तो उसे केवल आरोपों के आधार पर प्रारंभिक स्तर पर खारिज नहीं किया जा सकता।
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