दीप भांड
ये लाल रंग फिर एक बार तीन जवान जिंदगियों को लील गया...दिनोदिन गहराता ये लाल रंग ना जाने और कितना कहर बरपाएगा...जिस किसी ने भी मदिरा की खोज की होगी निश्चित ही उसने उसके ऐसे प्रयोग और परिणाम की कल्पना नहीं की होगी...हमने अक्सर देखा है आदर्श रूप में सुरक्षा बल के जवान एक नियत समय,नियत स्थान पर एहतियात एक जिम्मेदारी के साथ अपनी मस्ती को थोड़ा बढ़ाने के लिए शराब पीते है जिसकी एक तय सीमा होती है...तय सीमा से अधिक शक्कर आपको जानलेवा डायबिटीज की तरफ ले जाती है फिर ये तो शराब है...अधिकतर भारतीय अभी शराब के पीने का तरीका नहीं जानते है सीमा से अधिक शराब के परिणामों को देख कर भी अनदेखा करते है।अभी अधिकतर भारतीयों के हाथ में शराब मानो जैसे बंदर के हाथ उस्तरा लग गया हो...अब वो बंदर या तो खुद को या दूसरों को नुकसान पहुंचेगा ही कर रहेगा।
आजादी के 75 वर्ष बीत जाने के बाद भी ये देश का दुर्भाग्य है कि आज भी भारत के बहुत से राज्यों के राजस्व का मुख्य स्त्रोत शराब ही है। सरकारे अभी भी ऐसे आय के स्त्रोत पर निर्भर है जो लगभग जहर के समान और अनैतिक है।
इसकी अनैतिकता आप ऐसे समझिए यदि आपके मोहल्ले में कोई व्यक्ति कोई ऐसा काम करके पैसा कमाता है जिससे किसी का जीवन खराब हो तो हम बड़ी सहजता से ये कहते है कि ये व्यक्ति हराम की कमाई कर रहा है। एक पल के लिए सोचिए हमारी ये सरकारी क्या वही हराम की कमाई नहीं कर रही है जिससे लोगों का स्वस्थ और परिवार खराब हो रहे है। विडंबना ये कि सरकारों ने उस हराम की कमाई को बड़ा सुन्दर नाम दिया है "राजस्व" और उस तथाकथित राजस्व का उपयोग जनता के हितों के लिए किया जाता है... हमे नहीं चाहिए आपकी ऐसी हराम की कमाई जिसमें हितों से ज्यादा अहित छुपा हो,जिससे पीढ़ियां की पीढ़ियां बर्बाद होती आई हो,नैतिक रूप से आप इसे कैसे सही ठहराएंगे, व्यक्तित्व निर्माण की बात करने वाला भारत क्या शराब के छींटों से "चरित्र शुद्धि " करेगा...
यदि आर्थिक दृष्टि से भी देखे तो एक तरफ आप शराब बेच कर राजस्व इकट्ठा कर रहे है जनता को अच्छी स्वास्थ सेवाएं देने के लिए वही दूसरी तरफ उसी शराब को बेचकर कैंसर,लिवर एवं किडनी,हृदय रोग जैसी जानलेवा बीमारियों को जन्म दे रहे है यानी शराब से कमाया हुआ राजस्व शराब के मरीजों के लिए ही लगा दिया गया और जो पीढ़ियां,परिवार बर्बाद हुए वो अलग...ये कैसी अर्थव्यवस्था है यानी खाया पिया कुछ नहीं ग्लास तोड़ा...
रोज रात 11 बजे इंदौर पुलिस को आकाशवाणी होती है और पुलिस पूरी मुस्तैदी के साथ शराबियों की धरपकड़ में लग जाती है जो कि प्रशंसनीय है...किंतु 11 बजे के पहले और लगभग उसी समय शराब की दुकान के बाहर शराबियों की अस्तव्यस्त गाड़िया,दुकान के सामने और अवैध आहतों में खुलेआम शराब पीते गालिया बकते,झगड़ते,महिलाओं को छेड़ते शराबी...हमारी 11 बजे वाली सुपर कॉप को कैसे नजर नहीं आता ये खोज का विषय है...
लगभग हम सभी के घर कोई ना कोई काम वाली दीदी आती है बर्तन,झाड़ू, पोछा आदि का काम करने वाली दीदी हम बचपन से अपनी माता जी और उनकी बाते सुनते आ रहे है कि...आंटी जी हम कमाने जाते है और मेरा आदमी रोज रात को दारू पी के आता है घर आने के बाद दारू के लिए और पैसे मांगता है और नहीं देने पर मारता है,झगड़ा करता है।आप उन महिलाओं का त्याग और सहनशक्ति देखिए वो बस यह कह के कर रह जाती की अब क्या करो आंटी जी पति है उसको मार तो नहीं सकते,घर से निकाल तो नहीं सकते
है,शादी की है सहन तो करना पड़ता है बच्चों के लिए.... ये बातें पिछले 25 साल से अलग अलग दीदियों की मुंह से सुन चुका हु और आज भी ये स्थिति नहीं बदली है इसकी बड़ी जिम्मेदारी गैरजिम्मेदारी से शराब बेचने वालों की है यानी सरकार की..
सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए कि NGO की मदद से लोगों की शराब छुड़वाने का प्रयास करे,उन्हें उसके बुरे परिणाम बताए,उन्हें बच्चों की शिक्षा और कमाए हुए पेसो की सेविंग के लिए प्रेरित करे पर सरकारें बड़ी शान से दुकानों पर लिख देती है अंग्रेजी और देशी शासकीय शराब की दुकान...गजब है आप लोग।
अब समय है शराब पीने के लिए पूरी जिम्मेदारी के साथ लाइसेंस दिए जाने चाहिए जैसे कोई व्यक्ति किसी वाहन को चालने के लिए टेस्ट देता है, उसे कुछ नियमो को जानना पड़ता है उनका पालन करना पड़ता है वैसे ही शराब पीने के कुछ नियम जानना और उनका पालन करना आवश्यक होना चाहिए।
पूर्ण शराबबंदी कोई हल नहीं है इसके लिए कुछ बहुत ही कड़े नियम पर विचार किया जा सकता है जैसे शराब वही पिएगा जिसे शराब संबंधित कोई बीमारी ना हो,जिसे शराब पीने से घुस्सा ना आता हो,यदि परिवार को शराब पीने से आपत्ति है तो उसे लाइसेंस ना दिया जाए,जो अपना घर अच्छे से चलाने के बाद कुछ सेविंग कर पाता हो और नियमित टैक्स भरता हो,एक बार शराब पीकर कोई भी अपराध करने पर भारी जुर्माना एवं दूसरी बार करने पर सभी सरकारी सुविधाओं से वंचित किया जाए हालांकि इन सुझावों,विचारों के दो पहलू हो सकते है जिन पर बुद्धिजीवियों को साथ लेकर विचार किया जा सकता है अन्यथा इन मौतों और परिवार बर्बाद होने का सिलसिला जारी रहेगा।

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