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रेलन में मेलन में बगरयो बसंत है.......Spring has arrived in Railan and Melan...



                       • रवि उपाध्याय 

बसंत ऋतु को ऋतुओं की रानी कहा गया है। यह वह ऋतु है जिसमें कहते हैं कि बाग़- बगीचे वन उपवन सब महक जाते हैं। यह वह ऋतु है जिसमें नायक हो या नायिका सब बहक जाते हैं। सब बौरा जाते हैं। कलियां चटक कर पुष्प बन जातीं हैं और भंवरे गुन गुन कर गुनगुनाने लगते हैं। इसी वातावरण में मदहोश होकर शायद देवसेना ने गाया होगा ' मन क्यों बहका रे बहका,आधी रात को, बेला महका रे महका आधी रात को।

यह स्थिति तब की है जो हर चीज का एक मौसम और ऋतुएं हुआ करतीं थी। प्रत्येक का नियम और समय हुआ करता था अब सभी बंधन टूट गए हैं। अब तो मौसम बे मौसम कभी भी कोयल कुहक ने लगतीं हैं और बाग़ बगीचों में यौवन कभी भी महकने लगता है। भंवरे कभी भी उपवन में चक्कर काटने लगते हैं। तितलियां अब बगीचों में ही नहीं,बाजारों में भी रंग बखेरते हुए गाए- बगाहे मंडराने लगती हैं। 

अब बसंत मौसम का मोहताज नहीं है। अब वह मेलन में ठेलन में रेलन में, पेलन में,खेलन में,गुरुअन में,चेलन में,नेतन में, नेतिन में, नायक में नायिकन में पानी में, ज्ञानी में, मोड़न में,मोड़ींन में, दादा में दादिन में नाना में नानिन में जब चाहे तब नज़र आने लगता है। बसंत बहार का वह मौसम होता है कि जिसमें आम तो आम खास व्यक्ति यानि कवि भी बौरा जाता है। इसी का परिणाम है कि उसे चार की जगह पांच मौसम लगने लगते हैं। इसी के चलते वह गीत लिखता है पतझड़ सावन बसंत बहार, एक बरस में मौसम चार मौसम चार पांचवां मौसम प्यार का। इसे क्या तो कहिए बसंत ऋतु का असर या बावलापन।

बसंत पर अनेक साहित्यकार कवियों ने अनेकों कविताओं छंदों, दोहों का सृजन किया है। लेकिन बसंत पर सबसे अच्छी कविता सत्रहवीं सदी में एक रीतिकालीन कवि हुए हैं पदमाकर कवि, उनकी बसंत ऋतु पर लिखीं कविता श्रेष्ठ कविता है। वैसे तो सुमित्रानंदन पंत ने भी बसंत पर खूब लिखा है। परंतु पदमाकर की बसंत पर लिखी कविता एक कालजयी रचना है।

कवि पदमाकर ने बसंत ऋतु का अपनी लेखनी से जो चित्र खींचा है वह बहुत ही सुंदर और आनंद दायक है।उन्होंने लिखा है - कूलन में केलिन में कछारन में कुंजन में, क्यारिन में कलिन में कलीन किलकंत है ।कहे पद्माकर परागन में पौनहू में, पानन में पीक में पलासन पगंत है, द्वार में दिसान में दुनी में देस-देसन में। दैखो दीप- दीपन में दीपत दिगंत है। बीथिन में ब्रज में नवेलिन में बेलिन में, बनन में बागन में बगरयो बसंत है।

तो भाई साहब अब न तो बाग़ बगीचे बचे हैं और न ही क्यारियां बचीं हैं। अब वन हैं और न ही उपवन हैं, यदि कहीं हैं तो वहां कोयलियां कुहक भी नहीं पाती हैं। वन उपवन सब उजाड़ हो गए हैं। यह सब हालत देख कर वृक्षों के पर्ण भी तिल तिल हो कर हताशा में धराशाई होने लगे हैं। बसंत ऋतु अब मन मार कर बंगलों और महलों में कैद हो महकने लगी है। दिन के समय उपवन में फूलों का रस पान करने वाली रंग बिरंगी तितलियां अब रात को बंगलों, महलों और अट्टालिकाओं में उड़ती नज़र आतीं हैं। भंवरों की गुंजार शीशों के प्यालों की टकराहट में बदल जातीं है। फिज़ा में थाप के साथ एक महीन सी आवाज़ नीरवता को तोड़ती सुनाई देती है नज़र लागी राजा तोरे बंगले पर। नीचे दूर झोपड़ी से दो आँखें बंगलों के शीशे से झांकती रोशनी को देख बुदबुदा उठती है जो मैं होती तेरी कोयलिया कुहक........। तब ही बंगले से अगला स्वर फूट कर आता है ...जो मैं होती राजा तोरी बन की कोयलिया, कुहक रहती राजा तोरे बंगले पर...।

पदमाकर जी अब बसंत बहार अक्सर गाहे बगाहे इन्हीं बंगलों में आती है। वह अब किसी मौसम ऋतु या तिथि की मोहताज नहीं होती है। यह लोकतंत्र है। यहां ऋतुएं और मौसम सब कुछ तंत्र के आधीन है। लोक का मौसम तो अगस्त माह में स्कूलों में और चुनावों के अवसर पर आता है जब बच्चों को दो दो लडडू देकर बताया जाता है कि बच्चों अब तुम आज़ाद हो गए हो और यह लड्डू ही तुम्हारा इनाम है। चुनाव के मौसम में झोपड़ियों में पूड़ी सब्जी और एक एक शीशी दे कर खुशियां बांट दी जाती हैं। बदले में गरीब ईमानदार मतदाता अपना वोट दे कर एहसान चुकता कर देता है। क्योंकि गरीब एहसान फ़रोश नहीं होता। यह काम तो नेताओं का विशेषाधिकार है।

पदमाकर जी यहां अब फूल बगीचों में नहीं मिलते और न अब रमणियों के जुड़ों में ही पुष्प दिखाई देते हैं। कवि माखन लाल चतुर्वेदी द्वारा लिखित पुष्प की अभिलाषा, कविता के विपरीत अब फूलों की नीलामी मंडियों में होती हैं। लोकतंत्र आने पर कई मंडियां लगने लगीं हैं। जहां चुनाव दर चुनाव सपनों की, अपनों की नीलामी होती हैं। जैसे पशु मेलों में गधे, घोड़े और खास तौर पर  बकरों की मंडी में बकरों की बोली लगाई जाती है। वहां  बेचने वाले से ज्यादा, बकरों का मोल होता है। तब बकरा भी अपनी किस्मत पर मन ही मन इठलाता होगा कि मुझे हलाल करने वाले, मेरे सामने तेरी कोई कीमत नही है। तू सोचता है कि मुझे हलाल कर रब तेरी मन्नत पूरी करेगा, तो यह तेरी खाम ख्याली है। अरे जब वो मुझ निरीह की मदद नहीं कर सका तो फिर तू किस खेत की मूली है।

एक वह अलग दौर था जब फूलों से लदे वन उपवन,अपनी महक बिखेरते रहते थे। वहां रंग बिरंगी तितलियां,इस डाली से उस डाली, उस फूल से इस फूल पर उड़ उड़ कर उनके कपोल चूम लेतीं थीं। तब महिलाओं की चोटियां फूलों से गुंथी रहतीं थी। बालों के जूड़े, जूही और बेला के महकते श्वेत फूलों के गजरों और वेणियों से सजे रहते थे। रातरानी, रजनी गंधा और चंपा की सुरभि से मन बहक बहक जाता था, अब तो वह सब स्वप्न बन कर रह गया है। न अब वह वन उपवन बचे हैं और न ही वह गजरे, वेणियां और सुमन से गुंथी लंबी लंबी चोटियां लहराती नारियां ही बचीं हैं।

अब इस वसुंधरा पर जो नारियां हैं शेष बची हैं उन्होंने न जाने किस प्रण या संकल्प को पूरा करने के लिए अपने केश खोल लिए हैं। द्रौपदी ने तो अपने केशों इस संकल्प के साथ खोला था कि जब तक दु:शासन का वध नहीं हो जाएगा तब तक वह अपने केशों को खुला रखेंगी और उन्हें पापी दु:शासन की छाती से निकले खून से अपने केशों को धोने के बाद ही अपनी चोटी का शृंगार करेंगी और तब तक वह अपने केश खुले रखेंगी। आज की नारियों का खुले केश रखने का प्रण या संकल्प क्या है ? इससे नर जाति पशोपेश में है। हे प्रभु रक्षा करना। ऐसे में फूलों से गुंथी नागिन सी दाएं - बाएं लहराती लंबी चोटी या गजरा या वेणी से सज्जित जुड़े की कल्पना वैसी है जैसी आज के दौर में नैतिकता और मर्यादा पूर्ण आचरण वाली राजनीति की कल्पना करना। नेता, सियासी दल और सरकारें भी इस तरह की कल्पना से दूर हैं। अब एक ही आशा है कि वह सुबह कभी तो आएगी। वह सुबह कभी तो आएगी, जब धरती नग़में गाएगी।

यह सब नजारा देख कर कहा जा सकता है कि आज बसंत ऋतु बनन में, बागन में, न केली में, न कुंजन में कहीं नहीं बगरयो बसंत है। अब तो स्थिति यह है कि बसंत ऋतु अब मेलन में, रेलन में,पेलन में, मोबाइलन में, सिनेमन में, गुरुअन में, चेलन में भागरियों बसंत है। ऐसे धरती पर मनरियो बसंत है।


( लेखक व्यंग्यकार एवं एक राजनैतिक समीक्षक भी हैं। )


21012026

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