प्रणव बजाज
नई दिल्ली: 2026 का साल भारत की अपने पड़ोसी देशों के प्रति नीतिगत दृष्टिकोण के लिए निर्णायक साबित हो सकता है। वहीं, इस साल तालिबान 2.0 के साथ संबंधों को और बढ़ाया जा सकता है, जिसे नई दिल्ली की पड़ोसी नीति(Neighborhood Policy) की सफलता के रूप में देखने को मिल सकता है। इस साल मार्च के अंत तक बांग्लादेश, नेपाल और म्यांमार में होने वाले आम चुनावों के बाद 2026 में नई चुनौतियां उभर सकती हैं। ऐसे में सभी की निगाहें नेपाल और बांग्लादेश की सरकारों के गठन और भारत के सुरक्षा हितों पर इसके प्रभाव पर होंगी। बांग्लादेश पर विशेष ध्यान रहने की संभावना है क्योंकि वहां के इस्लामी कट्टरपंथी खुले तौर पर भारत को चुनौती दे रहे हैं। वैसे भी भारत अपने खिलाफ जहर उगलने वाले बांग्लादेश को भात (चावल) खिला रहा है। नेबरहुड फर्स्ट पॉलिसी के तहत बांग्लादेश के साथ संबंधों को लेकर भारत ज्यादा फोकस रहेगा।
नेपाल में राजनीतिक स्थिरता के साथ तय होगी कूटनीति
द इकनॉमिक टाइम्स पर छपे के एक लेख के अनुसार, नेपाल में नई दिल्ली को राजनीतिक स्थिरता की वापसी की उम्मीद होगी, जिससे देश को पिछली सरकारों की गलतियों के कारण पैदा हुए आर्थिक संकट से उबरने में मदद मिल सकती है। सितंबर की शुरुआत में हुआ दो दिवसीय जेन-जेड आंदोलन नेपाल के मुख्यधारा के राजनेताओं के लिए एक सबक है और अगला चुनाव देश की पारंपरिक पार्टियों के लिए अपनी दिशा सुधारने का एक अवसर है। नेपाल के साथ भारत के द्विपक्षीय संबंधों को चतुराई से संभाला गया है और नेपाल संकट ने भारत विरोधी कोई भी धारणा नहीं बनाई है।
नेपाल की नई सरकार बनाम भारत सरकार
काठमांडू में आने वाली सरकार को मौजूदा संबंधों को और मजबूत करना होगा, सीमा पार व्यापार को सुदृढ़ करना होगा और स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए भारतीय निवेश को आकर्षित करने की दिशा में काम करना होगा। वहीं, नई दिल्ली को हिमालयी राज्य म्यांमार में नए राजनीतिक नेताओं को राज्य-दर-राज्य दृष्टिकोण के बजाय राजनीतिक दृष्टिकोण से तैयार करने की आवश्यकता है।
म्यांमार के साथ खुल सकते हैं आर्थिक अवसर
म्यांमार में लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार नई दिल्ली का समर्थन चाहेगी। यांगून के सत्ता हलकों में भारत की साख को देखते हुए, अन्य कई लोकतंत्रों की तुलना में भारत सत्ता परिवर्तन से बेहतर ढंग से निपट सकता है। भारत से मिलने वाली वैधता प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध म्यांमार के लिए आर्थिक अवसर खोल सकती है।
सबसे बड़ी चुनौती बांग्लादेश से मिलेगी?
भारत की विदेश नीति के लिए सबसे बड़ी चुनौती बांग्लादेश से आ सकती है, जब तक कि ढाका में अगली सरकार संबंधों को सामान्य बनाने और भारत के मूल हितों को संबोधित करने तथा भारत विरोधी विचारों को नियंत्रित करने की प्रक्रिया शुरू नहीं कर देती। ऐतिहासिक रूप से, मजबूत भारत-बांग्लादेश संबंधों ने बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था को बढ़ावा दिया है। शेख हसीना सरकार के तहत द्विपक्षीय संबंधों में सीमा पार संपर्क और बिजली आपूर्ति सहित कई क्षेत्रों में उच्च स्तर का सहयोग देखा गया। पर्यटकों का सुचारू प्रवाह और बांग्लादेशी रोगियों के लिए भारत में अच्छी चिकित्सा सुविधाओं ने लाखों बांग्लादेशी नागरिकों को राहत प्रदान की है, साथ ही भारतीय अस्पतालों को भी लाभ पहुंचाया है।
बांग्लादेश को चावल खिला रहा भारत
बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने हाल ही में भारत से 50,000 टन चावल की अतिरिक्त खरीद को मंजूरी दे दी है। 15 दिसंबर को सरकारी खरीद संबंधी सलाहकार परिषद समिति की बैठक में उन्होंने भारत से 50,000 टन चावल आयात करने की बात कही। वित्त मंत्रालय के एक मीडिया बयान के अनुसार, यह निर्णय मंगलवार को सचिवालय में सरकारी खरीद संबंधी सलाहकार परिषद समिति की बैठक में लिया गया। वित्त सलाहकार सालेहुद्दीन अहमद ने इससे पहले भारत से दो चरणों में चावल आयात करने की योजना के बारे में बताया था।
भारत-बांग्लादेश संबंधों को कमजोर कर रहे यूनुस
ढाका में मौजूदा कट्टरपंथियों के समर्थन से चलने वाली मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार ने पिछले 15 वर्षों की उपलब्धियों को कमजोर करने का प्रयास किया है। आरोप है कि यह सरकार भारत की सुरक्षा के लिए खतरा पैदा करने वाली ताकतों को भी बढ़ावा देती है। इसी पृष्ठभूमि में बांग्लादेश राष्ट्रवादी पार्टी (बीएनपी) को एक मुख्यधारा की पार्टी के रूप में अपने दृष्टिकोण में सुधार करने की आवश्यकता है।
तारिक रहमान ने अभी साफ नहीं की नीति
बीएनपी नेता तारिक रहमान ने अभी तक अपनी विदेश नीति, विशेष रूप से भारत के संबंध में, स्पष्ट नहीं की है। नई दिल्ली उनकी गतिविधियों पर कड़ी नजर रख रही है। 2001 से 2006 के बीच उनके वास्तविक शासन की यादें द्विपक्षीय संबंधों पर गहरा प्रभाव छोड़ चुकी हैं और उनके हर कदम पर नजर रहेगी। एक पार्टी के रूप में, बीएनपी का मानना है कि भारत के साथ संबंध मजबूत करना दोनों देशों के हित में है। यदि रहमान प्रधानमंत्री बनते हैं, तो उनकी सबसे बड़ी चुनौती कट्टरपंथियों को नियंत्रित करना और समावेशी राजनीति का माहौल बनाना होगा।
भारत की नेबरहुड फर्स्ट पॉलिसी
भारत की 'पड़ोसी पहले' नीति एक विदेश नीति है जो क्षेत्रीय शांति, स्थिरता और आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए निकटवर्ती पड़ोसी देशों (अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, मालदीव, म्यांमार, नेपाल, पाकिस्तान, श्रीलंका) के साथ संबंधों को प्राथमिकता देती है। इसका उद्देश्य संपर्क, विकास और सहयोग पर जोर देना है। साथ ही चीन जैसे बाहरी प्रभावों का मुकाबला करना और आतंकवाद और अवैध प्रवासन जैसी सुरक्षा चिंताओं का समाधान करना है। प्रधानमंत्री मोदी द्वारा 2014 में औपचारिक रूप से शुरू की गई यह नीति परामर्श, गैर-पारस्परिकता और व्यापार, बुनियादी ढांचे और जन-जन संबंधों को मजबूत करके ठोस परिणाम प्राप्त करने पर बल देती है।हिंद महासागर में भारत की स्थिति बेहतर
पड़ोस के अन्य देशों की बात करें तो, हिंद महासागर क्षेत्र में नई दिल्ली की स्थिति बेहतर है, जहां श्रीलंका के साथ संबंधों ने अन्य देशों के लिए एक मिसाल कायम की है। मालदीव की स्थिति स्थिर बनी हुई है, वहीं मॉरीशस के साथ साझेदारी मजबूत हुई है और विक्टोरिया में नए शासन के तहत सेशेल्स के साथ संबंधों को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। वहीं, तालिबान 2.0 के नेतृत्व में अफगानिस्तान आने वाले वर्ष में भारत के साथ संबंधों को और अधिक मुख्यधारा में लाने का प्रयास करेगा। वहीं, इस नीति में बस एक पाकिस्तान ही है, जिसे साधना बड़ी चुनौती बना हुआ है। पाकिस्तान आतंकवाद को प्रायोजित करता आया है। ऐसे में उससे बातचीत के दरवाजे अक्सर खुलते-बंद होते रहते हैं।

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