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शोषण की वंशावली: जो माँ से बच्चे तक बहती हैThe lineage of exploitation: which flows from mother to child.

  सामाजिक विवशताओं में कुचलता मानवीय अधिकार

बाल श्रम और महिला शोषण: दो सिरों वाला एक ही जहरीला ती

·      कृति आरके जैन

समाज की सबसे अँधेरी सच्चाइयाँ अक्सर उन घरों में छिपी होती हैं, जहाँ रोशनी के नाम पर सिर्फ मजबूरी जलती है। ऐसे घरों में माँ का पसीना और बच्चे का बचपन एक साथ गिरवी रखा जाता है। गरीबी, अशिक्षा और असमानता की जंजीरों में जकड़ा यह तंत्र बाल श्रम और महिला शोषण को एक-दूसरे से अलग नहीं रहने देता। ये दोनों समस्याएँ अलग-अलग दिखाई भले ही दें, पर वास्तव में एक ही जहरीले तीर के दो सिरे हैं। एक सिर बच्चों के हाथों से किताब छीनता है, तो दूसरा महिलाओं के जीवन से सम्मान। यही तीर पीढ़ी दर पीढ़ी समाज को घायल करता चला जा रहा है।

इस तीर का सबसे मजबूत आधार गरीबी है, जो परिवारों को असहाय बना देती है। जब आय सीमित होती है और ज़रूरतें अनंत, तब निर्णय विवशता में लिए जाते हैं। माँ घर से बाहर काम पर जाती है, खेतों या कारखानों में दिन खपाती है, और बच्चे स्कूल की जगह काम की दुनिया में धकेल दिए जाते हैं। इस संघर्ष में सबसे अधिक मार महिलाओं और बच्चों पर ही पड़ती है। पुरुष प्रधान समाज में पुरुष का काम स्थायी माना जाता है, जबकि महिला और बच्चे को सस्ते श्रम के रूप में देखा जाता है। इसी सोच के कारण यह विषैला तीर और तेज हो जाता है।

बाल श्रम इस तीर का वह सिर है, जो मासूमियत को सबसे पहले भेदता है। कम उम्र में काम का बोझ उठाते बच्चे खेल, शिक्षा और सपनों से वंचित रह जाते हैं। ईंट-भट्टों, होटलों, घरेलू कामों और छोटे उद्योगों में लगे ये बच्चे न सिर्फ शारीरिक श्रम करते हैं, बल्कि मानसिक दबाव भी झेलते हैं। कई बार उनके साथ दुर्व्यवहार और हिंसा भी होती है। शिक्षा से दूर रहने के कारण वे अपने अधिकारों को पहचान ही नहीं पाते। यह स्थिति उन्हें जीवनभर के लिए कमजोर बना देती है और समाज को एक अशिक्षित पीढ़ी सौंप देती है।

इस तीर का दूसरा सिर महिला शोषण है, जो समान रूप से घातक है। असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली महिलाएँ कम मजदूरी, लंबे काम के घंटे और असुरक्षित माहौल झेलती हैं। घरेलू कामगार, खेत मजदूर या कारखानों में लगी महिलाएँ अक्सर यौन उत्पीड़न और मानसिक उत्पीड़न का शिकार होती हैं। उनकी मेहनत का उचित मूल्य नहीं मिलता और उन्हें निर्णय लेने का अधिकार भी नहीं दिया जाता। जब महिला स्वयं असुरक्षित होती है, तो उसका प्रभाव पूरे परिवार पर पड़ता है और बच्चे भी उसी असुरक्षा में पलते हैं।

बाल श्रम और महिला शोषण एक-दूसरे को जन्म देते हैं और एक-दूसरे को बढ़ाते हैं। जब महिला की आय कम होती है और उसका शोषण होता है, तो परिवार की आर्थिक स्थिति नहीं सुधरती। ऐसे में बच्चों को भी काम पर भेजना मजबूरी बन जाता है। वही बच्चे बड़े होकर फिर उसी व्यवस्था का हिस्सा बनते हैं, जहाँ महिलाएँ और बच्चे शोषण के चक्र में फँसे रहते हैं। इस प्रकार यह जहरीला तीर सिर्फ वर्तमान को नहीं, बल्कि भविष्य को भी घायल करता है। यह एक ऐसा दुष्चक्र है, जो बिना हस्तक्षेप के कभी नहीं टूटता।

सामाजिक रूढ़ियाँ इस तीर को और मजबूत बनाती हैं। लड़की को आज भी कई जगह बोझ समझा जाता है। उसकी शिक्षा पर कम ध्यान दिया जाता है और उससे कम उम्र में ही जिम्मेदारियाँ निभाने की अपेक्षा की जाती है। घरेलू काम, छोटे भाई-बहनों की देखभाल और बाहर का श्रम—यह सब उसकी दिनचर्या का हिस्सा बन जाता है। वहीं महिला को सहनशीलता और त्याग का प्रतीक बनाकर उसके शोषण को सामान्य मान लिया जाता है। ऐसी सोच बच्चों और महिलाओं दोनों को कमजोर स्थिति में धकेल देती है।

कानून और योजनाएँ इस समस्या से निपटने के लिए मौजूद हैं, लेकिन उनका प्रभाव सीमित है। बाल श्रम निषेध कानून, शिक्षा के अधिकार और महिला सशक्तिकरण की योजनाएँ कागजों पर मजबूत दिखती हैं, पर जमीनी हकीकत अलग है। प्रवर्तन की कमी, भ्रष्टाचार और जागरूकता के अभाव में ये प्रयास अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाते। कई बार बच्चे बचा लिए जाते हैं, लेकिन पुनर्वास और शिक्षा की व्यवस्था न होने से वे फिर उसी दलदल में लौट जाते हैं। महिलाओं के लिए बनी योजनाएँ भी तभी सफल होंगी, जब उन्हें सम्मान और सुरक्षा के साथ लागू किया जाए।

इस दो सिरों वाले जहरीले तीर को तोड़ने का सबसे प्रभावी हथियार शिक्षा है। गुणवत्तापूर्ण और सुलभ शिक्षा बच्चों को श्रम से दूर रख सकती है और उन्हें आत्मनिर्भर बना सकती है। साथ ही महिलाओं को कौशल प्रशिक्षण, सुरक्षित कार्यस्थल और समान वेतन मिलना अनिवार्य है। जब महिला आर्थिक रूप से सशक्त होगी, तभी वह अपने बच्चों को बेहतर भविष्य दे पाएगी। शिक्षा और सशक्तिकरण मिलकर ही इस दुष्चक्र को तोड़ सकते हैं।

समाज की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। केवल सरकार पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। परिवारों को यह समझना होगा कि बच्चे कमाई का साधन नहीं, बल्कि भविष्य की नींव हैं। महिलाओं को सम्मान देना और उनके श्रम का मूल्य समझना सामाजिक जिम्मेदारी है। जागरूकता, संवेदनशीलता और सामूहिक प्रयास से ही यह बदलाव संभव है। जब सोच बदलेगी, तभी व्यवस्था बदलेगी और यह जहरीला तीर अपनी धार खो देगा।

बाल श्रम और महिला शोषण के खिलाफ लड़ाई मानवता की लड़ाई है। यह संघर्ष कठिन जरूर है, पर असंभव नहीं। यदि आज समाज, सरकार और नागरिक मिलकर कदम उठाएँ, तो आने वाली पीढ़ियाँ एक सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन जी सकेंगी। बच्चों का बचपन और महिलाओं की गरिमा किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी पूँजी होती है। इस पूँजी की रक्षा करना हमारा नैतिक और सामाजिक कर्तव्य है, क्योंकि यही सच्चे अर्थों में प्रगति की पहचान है।

 

 

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