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इंदौर में प्राइवेट हॉस्पिटल से ज्यादा डॉक्टर सरकारी अस्पतालों में, फिर भी मरीजों को कर रहे रेफरIn Indore, there are more doctors in government hospitals than in private hospitals, yet they are still referring patients elsewhere.

 

इंदौर। इंदौर शहर के शासकीय अस्पतालों में इलाज के लिए बड़े-बड़े दावे तो किए जाते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि यहां पर्ची बनवाने से लेकर जांच करवाने और इलाज मिलने तक मरीजों को परेशानी का सामना करना पड़ता है। हालात यह है कि गंभीर बीमारी या आपात स्थिति में बड़ी संख्या में मरीज पहले शासकीय अस्पताल पहुंचते हैं, लेकिन कुछ ही समय बाद वे निजी अस्पतालों में रेफर करवा लेते हैं।


हाल ही में भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पानी के कारण बड़ी संख्या में लोग बीमार पड़े। शुरुआत में मरीजों को एमवायएच सहित अन्य सरकारी अस्पतालों में भर्ती कराया गया, लेकिन बाद में कई मरीजों को निजी बांबे अस्पताल में शिफ्ट किया गया। एमजीएम मेडिकल कॉलेज से जुड़े अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी नहीं है।

यहां निजी अस्पताल से अधिक विशेषज्ञ हैं, लेकिन समय पर मरीजों को इनकी उपलब्धता नहीं मिलती है। एमवाय अस्पताल में मेडिसिन, सर्जरी, आर्थोपेडिक्स, गैस्ट्रो, न्यूरो और अन्य विभागों में अनुभवी प्रोफेसर और सीनियर डॉक्टर उपलब्ध हैं। इसके बावजूद मरीजों का भरोसा निजी अस्पतालों की ओर ज्यादा दिखाई देता है। इसका बड़ा कारण अव्यवस्था, अत्याधिक भीड़ और सीमित संसाधन हैं।

इलाज के लिए लगाना पड़ती है गुहार

शासकीय अस्पतालों में इलाज की व्यवस्थाओं का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि यहां आईसीयू में भी स्टाफ नहीं मिलता है। मरीज के स्वजन को बार-बार उन्हें बुलाने के लिए गुहार लगाना पड़ती है। यदि निजी अस्पतालों के आईसीयू की बात करें तो वहां 24 घंटे विशेषज्ञ डाक्टर सहित अन्य स्टाफ रहता है। मरीज के स्वजन को सिर्फ घंटी बजाना पड़ती है और स्टाफ आ जाता है। स्टाफ का व्यवहार भी काफी अच्छा रहता है।

सिर्फ नाम का सुपर स्पेशिएलिटी

भागीरथपुरा के मरीजों को सुपर स्पेशिएलिटी अस्पताल में भर्ती नहीं किया गया। जबकि यहां के डॉक्टर अंतरराष्ट्रीय स्तर का इलाज देने का दावा करते हैं। हकीकत यह है कि यहां विभाग तो बना दिए हैं, लेकिन डॉक्टरों की कमी है। यहां इलाज के लिए उपकरण भी नहीं हैं।

डॉक्टरों की सैलरी पर होता है 35 करोड़ रुपये खर्च

एमजीएम मेडिकल कॉलेज में 300 से ज्यादा फैकल्टी हैं। कालेज के 750 पीजी स्टूडेंट और 250 इंटर्न (एमबीबीएस पासआउट) एमवायएच में प्रैक्टिस करते हैं। एमवायएच में 700 से ज्यादा नर्सिंग स्टाफ और 300 से ज्यादा पैरा मेडिकल स्टूडेंट हैं। इन सबके बावजूद गंभीर मरीजों को निजी अस्पताल शिफ्ट करना पड़ रहा है।

मेडिकल कॉलेज में डाक्टरों के वेतन पर ही प्रतिमाह 30 से 35 करोड़ रुपये खर्च होते हैं। इसके अलावा दवाइयां, रखरखाव, सफाई इत्यादि खर्च अलग हैं। इन खर्चों को जोड़कर देखें तो एमवायएच में औसतन 30 से 35 लाख रुपये रोजाना का खर्चा होता है, बावजूद इसके गंभीर मरीजों को निजी अस्पताल शिफ्ट करना पड़ रहा है।

जूनियर डॉक्टरों के भरोसे इलाज

एमजीएम मेडिकल कॉलेज से जुड़े अस्पतालों में करीब 350 डॉक्टर होंगे। इनमें सीनियर, जूनियर और रेजिडेंट डाक्टर शामिल हैं, लेकिन हमेशा यहां मरीजों का इलाज करते हुए जूनियर डॉक्टर ही नजर आते हैं। कई सीनियर डॉक्टर तो ओपीडी के समय भी निजी अस्पतालों में इलाज करते हैं। निजी अस्पताल में यहां के डॉक्टर मरीजों का बेहतर उपचार करते हैं। वहीं, निजी अस्पतालों में सीनियर डॉक्टर से मरीजों को इलाज मिल पाता है। डॉक्टर उन्हें समय देते हैं और बीमारियों के बारे में समझाते हैं।

सिटी स्कैन, एमआरआई तक की सुविधा नहीं

एमवाय अस्पताल में सिटी स्कैन और एमआरआई जांच तक की सुविधा नहीं है। गंभीर मरीजों को बाहर जाकर जांच करवाना पड़ती है। जिस कारण मरीजों को काफी परेशान होना पड़ता है। मरीजों को खुद ही स्ट्रैचर धकाना पड़ता है। वहीं, निजी अस्पताल में स्टाफ मरीज को स्वयं लेकर जाता है और जांच करवाता है।

मरीज अपनी मर्जी से प्राइवेट अस्पतालों में गए

प्राइवेट अस्पतालों में मरीज अपनी मर्जी से गए थे। शासन ने 29 दिसंबर को घोषणा की थी कि प्राइवेट अस्पतालों में मरीजों का निश्शुल्क उपचार होगा। इसके चलते मरीज निजी अस्पताल चले गए। - डॉ. माधव हासानी, सीएमएचओ

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