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एक और विमान हादसा, कब लेंगे सबक?Another plane crash; when will we learn our lesson?

 सम्पादकीय

यह किसी से छिपा नहीं कि शिवसेना और भाजपा में खटपट चलती ही रहती है। इस खटपट के बीच एनसीपी संतुलन कायम करने का काम करती थी। पिछले कुछ समय से यह चर्चा चल रही थी कि एनसीपी के दोनों गुट एक साथ आ सकते हैं। देखना है कि अब ऐसा होता या नहीं और होता है तो किस रूप में?


बारामती में महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री अजीत पवार की विमान हादसे में मौत ने देश में हवाई सुरक्षा को लेकर नए सिरे से सवाल खड़े कर दिए हैं। अपने देश में रह-रहकर विमान हादसे होते रहे हैं। इन हादसों में अजीत पवार की तरह कई नेताओं और आम लोगों ने अपनी जान गंवाई है। मुंबई से बारामती जा रहा विमान जिस तरह हादसे का शिकार हुआ और उसमें सवार चालक दल के सदस्यों के साथ सभी पांच लोग मारे गए, उसने सुरक्षित हवाई यात्रा को लेकर जो चिंताएं पैदा की हैं, उनका समाधान किया जाना इसलिए आवश्यक है, क्योंकि आम और खास लोगों की ओर से चार्टर विमान सेवाओं का उपयोग बढ़ता जा रहा है।

फिलहाल यह स्पष्ट नहीं कि बारामती में उतरने की कोशिश कर रहा विमान किन कारणों से विस्फोट के साथ आग का गोला बन गया। यह स्वाभाविक है कि विमान दुर्घटना जांच ब्यूरो की ओर से इस हादसे की जांच होगी और वह ब्लैक बाक्स की पड़ताल पर निर्भर करेगी, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि इसके पहले 2023 में मुंबई में वीएसआर एविएशन का बाम्बार्डियर लीयरजेट 45 विमान दुर्घटना का शिकार हुआ था। यह हैरानी की बात है कि अभी इस दुर्घटना की प्रारंभिक जांच रिपोर्ट ही सामने आ सकी है। ऐसा क्यों है, इस पर ध्यान दिया जाना चाहिए।

चूंकि अजीत पवार महाराष्ट्र के प्रभावशाली नेता थे और उन्होंने अपने चाचा शरद पवार से अलग होकर अपना अलग दल बनाया था और वही उसके कर्ता-धर्ता थे, इसलिए यह प्रश्न सतह पर आना स्वाभाविक है कि उनके न रहने पर उनका दल एनसीपी अस्तित्व में बना रहेगा या नहीं और उसकी कमान कौन संभालेगा? एक के बाद एक सरकारों में उप मुख्यमंत्री रहे अजीत पवार विवादों में भी रहे, लेकिन वे राजनीतिक रूप से सदैव प्रभावी बने रहे।

उन्होंने चाचा शरद पवार को चुनौती भी दी और उन पर भारी भी पड़े। पिछले लोकसभा चुनाव में उनकी एनसीपी का प्रदर्शन प्रभावशाली नहीं रहा था और उन्हें केवल एक सीट मिली थी, लेकिन विधानसभा चुनावों में उन्होंने 41 सीटें जीत कर अपनी राजनीतिक ताकत का आभास कराया था। उनका निधन महाराष्ट्र में राजनीतिक समीकरणों में बदलाव का कारण बन सकता है।

हालांकि संख्याबल के हिसाब से महाराष्ट्र सरकार में एनसीपी की अहमियत तीसरे नंबर की थी, लेकिन उसका महत्व इसलिए था कि वह भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार में एकनाथ शिंदे की शिवसेना के दबदबे को कम करने में सहायक थी। यह किसी से छिपा नहीं कि शिवसेना और भाजपा में खटपट चलती ही रहती है। इस खटपट के बीच एनसीपी संतुलन कायम करने का काम करती थी। पिछले कुछ समय से यह चर्चा चल रही थी कि एनसीपी के दोनों गुट एक साथ आ सकते हैं। देखना है कि अब ऐसा होता या नहीं और होता है तो किस रूप में?

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