फैटी लिवर आज तेजी से फैलती एक गंभीर मेडिकल कंडीशन बन चुकी है, जो शुरुआती दौर में बिना किसी स्पष्ट लक्षण के शरीर को नुकसान पहुंचाती है. मध्यप्रदेश में इसका खतरा कितना बड़ा है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि राज्य में पिछले साल 1.29 करोड़ लोगों में फैटी लिवर पाया गया था. ये आंकड़े तब सामने आए जब सरकार द्वारा पिछले साल जून में अस्पतालों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों के माध्यम से फैटी लिवर स्क्रीनिंग अभियान चलाया गया. अब इस चुनौती से निपटने की दिशा में एम्स भोपाल की नई रिसर्च उम्मीद की किरण बनकर सामने आई है, जो फैटी लिवर के छुपे हुए लक्षणों की भी शुरुआती पहचान संभव बना सकती है.
क्या है फैटी लिवर और क्यों बढ़ा खतरा?
फैटी लिवर वह स्थिति है, जिसमें लिवर में जरूरत से ज्यादा फैट या चर्बी जमा हो जाती है. इसके कारणों में शराब का सेवन, मांसाहार, अधिक फैट वाला भोजन, अनावश्यक दवाइयों का उपयोग और कुछ वायरल संक्रमण जैसे हेपेटाइटिस सी समेत अन्य कारण शामिल हैं. मौजूदा दौर में खराब लाइफस्टाइल, मोटापा, डायबिटीज और ब्लड में बढ़ा कोलेस्ट्रॉल इसके सबसे बड़े कारण बन गए हैं. ऐसे लोगों में फैटी लिवर होने की संभावना करीब 60 प्रतिशत तक पाई जाती है. शराब के बिना होने वाले फैटी लिवर को नॉन एल्कोहॉलिक फैटी लिवर डिजीज (NAFLD) और शराब से होने वाले को एल्कोहॉलिक फैटी लिवर डिजीज कहा जाता है.
एम्स भोपाल की रिसर्च में नए बायोमार्कर पर फोकस
एम्स भोपाल के जैव रसायन विभाग में पीएचडी थीसिस के अंतर्गत डॉ. दीपा रोशनी ने फैटी लिवर रोग की शीघ्र पहचान के लिए नए बायोमार्कर पर महत्वपूर्ण शोध प्रस्तुत किया है. यह शोध नॉन-एल्कोहोलिक फैटी लिवर रोग के बढ़ते खतरे और मौजूदा जांच विधियों की सीमाओं को ध्यान में रखकर किया गया. इस अध्ययन में एडिपोनैक्टिन, आईरिसिन और साइटोकेराटिन-18 को संभावित गैर-आक्रामक बायोमार्कर के रूप में परखा गया है, जिसके चौकाने वाले परिणाम सामने आए हैं.
बीमारी की गंभीरता से जुड़ा बायोमार्कर बदलाव
क्लिनिकल और बायोइन्फॉर्मेटिक विश्लेषण में यह सामने आया कि जैसे-जैसे फैटी लिवर की गंभीरता बढ़ती है, एडिपोनैक्टिन और आईरिसिन का स्तर घटता जाता है, जबकि साइटोकेराटिन-18 का स्तर बढ़ जाता है. यह बदलाव बॉडी मास इंडेक्स, लिवर एंजाइम और लिपिड प्रोफाइल में गिरावट के साथ स्पष्ट रूप से देखा गया. इस शोध में यह भी पाया गया कि साइटोकेराटिन-18 की पहचान क्षमता सबसे अधिक रही. ये आगे चलकर लक्षण पहचानने में काफी मददगार साबित हो सकता है.
लिवर पूरी तरह खराब होने से पहले ही चल जाएगा पता
शोध के अनुसार तीनों बायोमार्कर को एक साथ देखने पर रोग की गंभीरता का आंकलन और अधिक सटीक हो जाता है. बायोइन्फॉर्मेटिक अध्ययन में संबंधित जीन की अभिव्यक्ति में भी महत्वपूर्ण बदलाव पाए गए, जो इन निष्कर्षों को मजबूती देते हैं. यह रिसर्च फैटी लिवर की शुरुआती पहचान, जोखिम निर्धारण और नियमित निगरानी के लिए आसान जांचों में बेहद मददगार साबित हो सकती है. इससे लिवर पूरी तरह खराब होने से काफी पहले ही मरीज को उसकी स्थिति के बारे में बतया जा सकेगा और साथ ही संभावित ट्रीटमेंट भी दिया जा सकेगा.
इस रिसर्च को लेकर एम्स भोपाल के कार्यपालक निदेशक प्रो. डॉ. माधवानन्द कर ने कहा, '' यह शोध फैटी लिवर जैसे तेजी से बढ़ते रोग की समय पर पहचान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा. गैर-आक्रामक बायोमार्करों पर आधारित यह अध्ययन रोगियों को अधिक सटीक, सुरक्षित और प्रभावी जांच की सुविधा प्रदान करने की दिशा में एक सार्थक पहल है.''

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