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1000 साल बाद भी अडिग, भारतीय सभ्यता का अमर प्रतीक सोमनाथ मंदिर; 11 जनवरी को PM मोदी करेंगे दौरा Even after 1000 years, the Somnath Temple stands unwavering, an immortal symbol of Indian civilization; PM Modi will visit on January 11th.

सोमनाथ यह नाम सुनते ही भारत की आत्मा, आस्था और गौरव का एहसास होता है। गुजरात के प्रभास पाटन में स्थित सोमनाथ मंदिर भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में पहला माना जाता है। यह मंदिर सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि हजारों साल पुरानी भारतीय सभ्यता, विश्वास और संघर्ष की कहानी भी है। वर्ष 2026 सोमनाथ के इतिहास में एक खास पड़ाव है, क्योंकि इस वर्ष इस पवित्र मंदिर पर हुए पहले आक्रमण को 1000 साल पूरे हो रहे हैं।



सोमनाथ मंदिर का उल्लेख द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र में सबसे पहले आता है- "सौराष्ट्रे सोमनाथं च"। इसका अर्थ है कि सोमनाथ को प्रथम ज्योतिर्लिंग के रूप में सर्वोच्च स्थान दिया गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, "सोमलिंगं नरो दृष्ट्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते", अर्थात जो व्यक्ति सोमनाथ शिवलिंग के दर्शन करता है, वह पापों से मुक्त होता है, मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और मृत्यु के बाद स्वर्ग की प्राप्ति होती है।

समुद्र तट पर स्थित यह मंदिर न केवल आध्यात्मिक शक्ति का केंद्र था, बल्कि प्राचीन भारत की आर्थिक और समुद्री समृद्धि का भी प्रतीक था। यही कारण था कि इसकी ख्याति दूर-दूर तक फैली।

1026 का आक्रमण और ऐतिहासिक त्रासदी

जनवरी 1026 में महमूद गजनवी ने सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण किया। इस हमले का उद्देश्य लूट या आस्था नहीं, बल्कि एक महान धार्मिक और सभ्यतागत प्रतीक को नष्ट करना था। इतिहास के विवरण बताते हैं कि इस आक्रमण में भारी हिंसा हुई, नगर के लोगों पर अत्याचार किए गए और मंदिर को गंभीर क्षति पहुंचाई गई। इन घटनाओं का प्रभाव पूरे भारत के मनोबल पर पड़ा।

लेकिन सोमनाथ की कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। यह कहानी सिर्फ विनाश की नहीं, बल्कि बार-बार उठ खड़े होने की है। मध्यकाल में सोमनाथ पर कई बार हमले हुए, लेकिन हर बार भारतीय समाज ने मंदिर को दोबारा खड़ा किया। यह मंदिर हर पीढ़ी के संघर्ष, त्याग और आस्था का प्रतीक बनता गया।

महारानी अहिल्याबाई होलकर जैसी महान विभूतियों ने भी सोमनाथ के पुनर्निर्माण में अहम भूमिका निभाई, ताकि भक्त फिर से यहां पूजा कर सकें। 1890 के दशक में स्वामी विवेकानंद ने सोमनाथ का दौरा किया। 1897 में चेन्नई में दिए अपने भाषण में उन्होंने कहा कि सोमनाथ जैसे मंदिर भारत के इतिहास और राष्ट्रीय चेतना को किताबों से बेहतर समझाते हैं।

आजादी के बाद पुनर्निर्माण और ऐतिहासिक फैसला

आजादी के बाद 1947 में सरदार वल्लभभाई पटेल सोमनाथ पहुंचे। दिवाली के समय मंदिर की स्थिति देखकर वे इतने व्यथित हुए कि उन्होंने वहीं घोषणा कर दी कि सोमनाथ का पुनर्निर्माण किया जाएगा।

11 मई 1951 को भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की उपस्थिति में पुनर्निर्मित सोमनाथ मंदिर भक्तों के लिए खोला गया। दुर्भाग्य से सरदार पटेल इस दिन जीवित नहीं थे, लेकिन उनका सपना साकार हो चुका था। उस समय के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू इस कार्यक्रम को लेकर सहज नहीं थे। वे नहीं चाहते थे कि राष्ट्रपति या मंत्री इस समारोह से जुड़ें। बावजूद इसके, डॉ. राजेंद्र प्रसाद अपने निर्णय पर अडिग रहे।

इस पूरे प्रयास में केएम मुंशी की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण रही। उन्होंने सरदार पटेल का पूरा साथ दिया और सोमनाथ पर प्रसिद्ध पुस्तक 'Somanatha: The Shrine Eternal' लिखी, जो आज भी एक अहम ऐतिहासिक दस्तावेज मानी जाती है।

मुंशी जी के अनुसार, भारतीय सभ्यता का विश्वास है कि जो शाश्वत है, वह नष्ट नहीं हो सकता। गीता का श्लोक- "नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि",इसी भावना को दर्शाता है। सोमनाथ इसी अमर आत्मा का जीवंत उदाहरण है।

आज का सोमनाथ

आज 1000 साल बाद भी सोमनाथ का समुद्र उसी गर्जना के साथ लहरें उठाता है। यह लहरें हमें याद दिलाती हैं कि चाहे कितनी भी बार गिराया गया, सोमनाथ हर बार फिर खड़ा हुआ। आक्रमणकारी इतिहास में विनाश के प्रतीक बनकर रह गए, जबकि सोमनाथ आज भी आस्था, विश्वास और उम्मीद की रोशनी बनकर खड़ा है।

सोमनाथ हमें सिखाता है कि नफरत और कट्टरता कुछ समय के लिए नष्ट कर सकती हैं, लेकिन विश्वास और सद्भावना ही हमेशा सृजन करती हैं। अगर सोमनाथ हजार साल के हमलों के बावजूद फिर से खड़ा हो सकता है, तो भारत भी अपनी सभ्यतागत गौरव को फिर से हासिल कर सकता है। श्री सोमनाथ महादेव के आशीर्वाद से भारत विकसित भारत की ओर आगे बढ़ रहा है, जहां प्राचीन ज्ञान और आधुनिक सोच मिलकर पूरी दुनिया के कल्याण का मार्ग दिखाएंगे।

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