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प्रदूषण पर करना होगा कुछ जमीनी काम...!We need to do some practical work to tackle pollution...!

 

प्रणव बजाज

दिल्ली ने बीते पूरे माह घुट-घुटकर सांस ली है। नवंबर के 24 दिनों में एयर क्वॉलिटी इंडेक्स 300 के ऊपर रहा यानी बहुत खराब और 3 दिन तो यह 400 के ऊपर चला गया मतलब गंभीर। महज तीन दिनों के लिए AQI 300 के नीचे आया, और वह भी हवाओं की बदौलत। ये आंकड़े देश की राजधानी में वायु प्रदूषण का हाल बयान कर देते हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का इस मामले को संज्ञान में लेना महत्वपूर्ण हो जाता है।


शीर्ष अदालत ने CAQM और NCR की स्टेट अथॉरिटीज को प्रदूषण से निपटने के लिए स्पष्ट, समयबद्ध और ऐसी योजना तैयार करने के लिए कहा है, जिस पर अमल किया जा सके। अदालत ने बिल्कुल ठीक कहा कि हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठा जा सकता और समाधान विशेषज्ञों की तरफ से आना चाहिए।

पराली दोषी नहीं: दिल्ली-एनसीआर में हर साल दिवाली के बाद वायु प्रदूषण का स्तर बढ़ जाता है और सर्दियों में हालात बद से ++ बदतर हो जाते हैं। लेकिन, इस बार तो राहत का कोई दिन मिला ही नहीं । सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई पराली पर भी नहीं डाला जा सकता। और सबसे बड़ी बात है कि दोष इस सीजन दिल्ली के प्रदूषण में पराली के धुएं का हिस्सा 5% से भी कम रहा है। सरकार ने संसद में सोमवार को ही जानकारी दी कि पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने की घटनाओं में 2022 की तुलना में 90% की कमी आई है।

नई स्टडी की जरूरत: खासकर दिल्ली-एनसीआर के केस में पराली जलाने को हमेशा से एक बड़ी समस्या के रूप में पेश किया गया है। लेकिन, SAFAR और IIT दिल्ली ने 2018 में जो इन्वेंट्री रिपोर्ट तैयार की थी, उसके मुताबिक राजधानी में प्रदूषण की सबसे बड़ी वजह वाहन हैं। SAFAR के मुताबिक, PM2.5 के लिए 41% ट्रांसपोर्ट और 21% धूल जिम्मेदार है, जो ज्यादातर कंस्ट्रक्शन साइट से उड़ती है । हालांकि यह रिपोर्ट भी पुरानी पड़ चुकी है, और एक्सपर्ट्स का कहना है कि नई स्टडी होनी चाहिए।राजनीति न करें: सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी कि पराली तो कवि के समय भी जलाई जा रही थी पर तब आसमान साफ और नीला था, और इस मुद्दे को राजनीति या अहं की लड़ाई न बनाएं। सरकारों के लिए संदेश है कि दोषारोपण के बजाय मिलकर काम करने की जरूरत है। वर्ल्ड बैंक की पिछले साल की एक रिपोर्ट चेताती है कि भारत की पूरी आबादी वायु प्रदूषण के खतरे में है। इसकी वजह से देश की GDP के 3% के बराबर नुकसान हा है। इससे लड़ने के लिए प्रभावी उपाय चाहिए, और वह भी पूरे देश में।

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