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बिहार चुनाव : मटन,मच्छी और मात Bihar Elections: Mutton, Fish and Mother

 

 रवि उपाध्याय 

बिहार में विधानसभा के नए चुनावों के बाद नीतीश कुमार के नेतृत्व में नई सरकार बन चुकी है। विपक्षी राजनीतिक दलों द्वारा अपनी पराजय की अपने अपने ढंग से सतही मीमांसा की जा रही है और आगे भी की जाती रहेगी। विपक्षी दलों द्वारा जो हार की मीमांसा की जा रही है उसकी तुलना शुतुरमुर्ग से की जा सकती है। उनके द्वारा की जा रही अपनी पराजय की समीक्षा एक तरह अपने फेस सेविंग (चेहरा छिपाने)के अलावा कुछ और नहीं प्रतीत है।


यदि बिहार विधानसभा चुनावों की ईमानदारी से मीमांसा की जाए तो ही इसकी वजह पता चल सकती है। अन्यथा यह कसरत निरर्थक और हरेक पराजय के बाद की जाने वाली रस्मी कसरत के अलावा कुछ नहीं है। केवल कुछ लोग इकठ्ठा होंगे। एक दूसरे पर आरोप लगाएंगे। घोड़े की बला तबेले के सिर फोड़ कर समीक्षा की इतिश्री हो जाएगी। यही बिहार चुनाव के बारे में देखने को मिल रहा है। विरोधी दलों ने या महागठबंधन ने अपनी हार के लिए नीतीश कुमार सरकार द्वारा चुनाव से पहले महिलाओं को दस दस हजार रुपए दिए जाने को, सरकारी मिशनरी का दुरूपयोग, कथित रूप से एसआईआर को दोषी ठहराया। उनका आरोप था कि उनकी हार का मुख्य कारण, चुनाव आयोग द्वारा एसआईआर में काटे गए 65 लाख वोट जिम्मेदार हैं।

चुनाव में जय- पराजय मूलतः दल और उसके नेता की जनता में छबि तथा ट्रैक रिकॉर्ड पर निर्भर करती है। उपरोक्त लिखी गई पंक्तियों में जनता शब्द का उपयोग मेरे द्वारा जानबूझ कर किया गया है। यह सही है कि चुनाव में मतदान जनता नहीं बल्कि मतदाता करता है। जनता शब्द में मतदाता और गैर मतदाता दोनों शामिल हैं। गैर मतदाता वह किशोर है जिसकी आयु विधि अनुसार मतदान के लिए निर्धारित से कम है। लेकिन यह जान लेना चाहिए है कि इस उमर के किशोर शिक्षित, अध्ययन और मनन शील और छिन्द्रान्वेशी होता है। परिवार में इनकी राय की, खासतौर से ग्रामीण क्षेत्र में, एक महत्वपूर्ण भूमिका होती है। उनकी यही राय जनमत बनाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निर्वाह करती है। देखा जाए तो बिहार के मतदाताओं में नीतीश कुमार की छबि तेजस्वी यादव सहित महागठबंधन के सभी नेताओं पर बीस पड़ी।

जबकि वास्तविकता यह है कि महा गठबंधन में शामिल दो बड़े दलों की चुनाव पूर्व और चुनाव की घोषणा के बाद की गतिविधियों से बिहार का मतदाता खुश नहीं था। 

मटन कांड 

अब हम चर्चा करेंगे राजद की चुनाव पूर्व की गतिविधियों पर। चलिए हम चलते हैं दिल्ली में घटित 5 अगस्त 2023 की उस घटना पर जिसने लाखों बिहार और देशवासियों को आहत किया। घटना के समय सावन का महीना चल रहा था। इस महीने में आम तौर अधिकांश लोग सात्विक जीवन व्यतीत करते हैं। शंकर भगवान को समर्पित इस धार्मिक महीने में सनातनी मांस - मछली तथा मद्यपान से परहेज करते हैं।इसी माह में रक्षाबंधन और श्री कृष्ण जन्म का पर्व भी आता है। 

लेकिन इसी महीने में राजद के राष्ट्रीय अध्यक्ष और किसी भी तरह के चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित लालू प्रसाद यादव, अपने दिल्ली स्थित आलीशान आवास पर कांग्रेस के सबसे बड़े नेता, सांसद राहुल गांधी को लाइव रूप से मटन बनाना सिखा रहे थे। इस मौके पर तेजस्वी यादव, उनकी बहन मीसा यादव और राबड़ी देवी भी मौजूद थीं। इस वीडियो को यू ट्यूब पर स्वयं राहुल गांधी द्वारा अपलोड किया। उनका यह वीडियो न्यूज़ चैनलों पर भी प्रदर्शित किया गया। उनका यह कदम देश के एक सबसे बड़े तबके को उनकी यह हरकत पसंद नहीं आई बल्कि उनका यह कदम देश और बिहार के एक बड़े की धार्मिक वर्ग की भावनाओं को जानबूझ कर चिढ़ाने वाला भी लगा।

मच्छी कांड 

बात इतने पर ही नहीं रुकी लोकसभा चुनाव 2024 के प्रचार के दौरान अप्रैल माह में जब पूरे देश में देवी आराधना का पर्व नवरात्रि चल रहा था तब भी राजद के कर्ता धर्ता और संचालक तथा बिहार विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता और पूर्व उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव अपने महागठबंधन के साथी वीआईपी पार्टी के सुप्रीमों मुकेश सहनी के साथ हेलिकाप्टर में चुनावी सफ़र कर रहे थे। तब वह मच्छी का न केवल सेवन कर रहे थे बल्कि उसका जायका, मच्छी की विशेषता का बखान कर रहे थे। सहनी मिर्च दिखाते हुए कह रहे थे की अब किसी को यह वीडियो से मिर्ची लगे तो लगे। वे वीडियो बना कर उसे सार्वजनिक रूप से प्रसारित भी करवा रहे थे। यह वीडियो भी न्यूज़ चैनलों पर खूब दिखाया गया। उनकी यह हरकत बिहार वासियों को निश्चित रूप से नागवार लगी होगी।

एसआईआर का विरोध 

बिहार विधानसभा चुनाव की घोषणा के पूर्व निर्वाचन आयोग ने बिहार में मतदाता सूचियों के गहन पुनरीक्षण का कार्य शुरू किए जाने की घोषणा की। इस घटना का तेजस्वी यादव ने बिहार विधानसभा सत्र में उग्र विरोध कर इसका विरोध किया। लोकसभा के मानसून सत्र के दौरान भी एसआईआर उग्र विरोध किया। चुनाव आयोग और मोदी सरकार पर वोट चोरी का आरोप लगाते हुए ' नारा दिया वोट चोर गद्दी छोड़'। एसआईआर के खिलाफ इंडिया ब्लॉक सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की परन्तु सुप्रीम कोर्ट वोटर लिस्टों के गहन पुनरीक्षण के कार्य को रोकने की याचिका ठुकरा दी। जबकि बिहार का आम मतदाता वोटर लिस्टों के गहन जांच के पक्ष में था। उसे महागठबंधन के दलों का एसआईआर का विरोध पसंद नहीं आया।

बिहार में जहां लोकसभा चुनाव में वोटर्स की जो संख्या 7.91 करोड़ थी वोटर्स की गहन पुनरीक्षण के बाद वह संख्या घट कर 7.41रह गई। पुरानी सूची से 65 लाख ऐसे वोटरों के नाम हटा दिए गए जो या तो मर गए थे या संबंधित पोलिंग बूथ छोड़ कर कहीं दूसरे क्षेत्र, गांव,शहर या राज्य छोड़ कर कहीं और चले गए। इन 65 लाख लोगों में से एक भी यह दावा करने सामने नहीं आया जो यह कह सके कि उसका नाम मतदाता सूची से गलत ढंग से काटा गया। इन अदृश्य एवं भूत हो चुके लोगों के नाम मतदाता सूची से हटने का परिणाम यह हुआ कि फर्जी नाम हटने से बिहार विधानसभा चुनावों का मतदान प्रतिशत करीब 12 प्रतिशत बढ़ गया। जबकि बिहार में मतदान का प्रतिशत 2010 में पहली बार 60 प्रतिशत के स्तर तक पहुंच सका। इसके पहले और 2024 के लोकसभा चुनावों तक मतदान प्रतिशत 55 से 58 तक ही झूलता रहा।

अपशब्दों का प्रयोग 

विधानसभा चुनाव 2025 में प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री मोदी की स्वर्गीय मां के खिलाफ सार्वजनिक मंच से घृणित शब्दों के उपयोग को भी जनता विशेषतौर पर महिला मतदाताओं को बिल्कुल पसंद नहीं किया और महागठबंधन की चुनाव में करारी हार का यह भी एक बड़ा कारण बना।

कानून व्यवस्था और जंगलराज 

बिहार के मतदाताओं के मानस में लालू प्रसाद यादव के मुख्यमंत्रित्व समय के जंगल राज भलीभांति जिंदा रहा। इस पर आग में घी डालने का काम राजद के समर्थन में सोशल मीडिया पर वायरल उन वीडियो ने किया जिनमें भैया का राज आने के बाद कट्टे बम की बात की गई थी।  इन वीडियो ने जंगल राज की यादों को और पक्का कर दिया। 

महागठबंधन के नेताओं ने बिहार में जनवरी से अक्टूबर तक बिहार में घटी हिंसा और हत्याओं की घटनाओं को नीतीश सरकार की नाकामयाबी से जोड़ कर राजग सरकार पर प्रहार किया। यह दांव नहीं चल पाया। बिहार के मतदाताओं ने इन घटनाओं के पीछे नीतीश कुमार के विरोधी नेताओं की चाल और बिहार सरकार को बदनाम करने का हथकंडा माना।

विकास कार्यों का लाभ 

इसके अलावा नीतीश कुमार ने अपनी सरकार के करीब 20 सालों के रिकॉर्ड कार्यकाल के दौरान किए गए विकास कार्यों से बिहार की जनता खुश थी। इसके अलावा बिहार के मतदाताओं में मोदी का जादू भी व्याप्त था। हां यह भी सत्य है कि बिहार नीतीश कुमार द्वारा दो बार इधर से उधर पाला बदलने से नाराज़ थी। परंतु जब नीतीश कुमार ने अनेक सार्वजनिक मंच से प्रधानमंत्री मोदी से अपने पुरानी गलतियों के लिए माफ़ी मांगते हुए कहा कि वे अब वो कभी भी कहीं और नहीं जाएंगे और एनडीए के साथ बने रहेंगे। इसका भी बिहार की जनता पर सकारात्मक असर हुआ।

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