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इतिहास का पुनर्पाठ या बीते सच का हिसाब?

संपादकीय | प्रणव बजाज



इतिहास केवल तारीखों और राजाओं की सूची नहीं होता। इतिहास यह भी तय करता है कि अगली पीढ़ी अपने अतीत को किस नजर से देखेगी। इसलिए NCERT की कक्षा 9 की नई सामाजिक विज्ञान पुस्तक ‘Understanding Society: India and Beyond – Part 2’ में मध्यकालीन भारत की प्रस्तुति में आया बदलाव सामान्य पाठ्यक्रम संशोधन मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह उस लंबे विवाद को फिर सामने लाता है कि भारतीय इतिहास पढ़ाते समय आक्रमण, सत्ता, प्रतिरोध, सहयोग, संस्कृति और समाज—इनमें से किसे कितना स्थान मिला?


नई पुस्तक ने 1000 से 1700 ईस्वी के दौर को मुख्यतः “Resistance and Resilience” यानी प्रतिरोध और जिजीविषा के नजरिये से रखा है। इसमें दिल्ली सल्तनत और मुगल सत्ता के साथ-साथ उन भारतीय शक्तियों को भी जगह दी गई है, जिन्होंने अलग-अलग समय पर विस्तारवादी शक्तियों का मुकाबला किया। महाराणा प्रताप और मेवाड़, अहोम शक्ति और लचित बोरफुकन, विजयनगर, मराठों, जाट विद्रोहों और सिख गुरुओं के संघर्ष को पहले की तुलना में कहीं अधिक प्रमुखता मिली है।


यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इतिहास की किताब में प्रतिरोध को फुटनोट और सत्ता को मुख्य कथा बना देना भी इतिहास-बोध को अधूरा कर सकता है। लेकिन यहां एक दूसरी सावधानी भी जरूरी है—इतिहास का पुनर्लेखन पुराने पक्षपात को हटाकर नया पक्षपात स्थापित करने का माध्यम नहीं बनना चाहिए।


यही असली कसौटी है।


महाराणा प्रताप की लड़ाई पढ़ाई जानी चाहिए, तो अकबर के दौर की राजनीतिक संरचना भी तथ्य सहित पढ़ाई जानी चाहिए। लचित बोरफुकन और सरायघाट का युद्ध पढ़ाया जाना चाहिए, तो मुगल-अहोम संबंधों के पूरे संदर्भ को भी समझाया जाना चाहिए। गुरु अर्जन देव, गुरु तेग बहादुर और गुरु गोविंद सिंह के इतिहास को दबाया नहीं जाना चाहिए, लेकिन मध्यकालीन समाज को केवल शासक और धार्मिक संघर्ष की दृष्टि से भी नहीं देखा जा सकता। नई किताब में सिख गुरुओं के प्रति मुगल शासन की कठोरता को विशेष रूप से रेखांकित किया गया है।


मंदिरों के इतिहास को लेकर भी लंबे समय से असहज चुप्पियां रही हैं। काशी विश्वनाथ का इतिहास इसका उदाहरण है। वाराणसी के आधिकारिक पोर्टल के अनुसार वर्तमान मंदिर का निर्माण 1780 में महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने कराया था। 1580 के दशक के पूर्ववर्ती मंदिर के निर्माण में राजा टोडरमल और मान सिंह से जुड़े विवरण भी ऐतिहासिक स्रोतों में मिलते हैं। इसलिए मंदिरों के विध्वंस, पुनर्निर्माण और संरक्षण—तीनों को दस्तावेजी प्रमाणों के साथ पढ़ाना जरूरी है।


लेकिन सबसे बड़ा सवाल इससे भी आगे है।


क्या भारत का इतिहास केवल उन लोगों से शुरू होता है जो दिल्ली की गद्दी पर बैठे?


यदि उत्तर नहीं है, तो इतिहास में उन राजाओं, जनजातीय शक्तियों, महिलाओं, संतों, किसानों, स्थानीय राज्यों और प्रतिरोध आंदोलनों को भी पर्याप्त जगह मिलनी ही चाहिए, जिन्होंने भारत की सामाजिक और राजनीतिक संरचना को आकार दिया।


नई पुस्तक में भारतीय शासन परंपरा को भी वैदिक सभा-समिति, राजधर्म, कौटिल्य, रामराज्य और सेंगोल जैसे संदर्भों से आधुनिक संवैधानिक व्यवस्था तक जोड़ने का प्रयास किया गया है। यह दृष्टिकोण विद्यार्थियों को यह समझाने में मदद कर सकता है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की चर्चा केवल पश्चिमी राजनीतिक इतिहास से शुरू नहीं होती। नई पुस्तक में भारतीय परंपराओं और आधुनिक संविधान-आधारित शासन के बीच संबंध स्थापित करने पर जोर दिया गया है।


पर यहां भी एक सवाल जरूरी है—भारतीय परंपरा का सम्मान और इतिहास का आलोचनात्मक अध्ययन, दोनों साथ चलेंगे या नहीं?


क्योंकि इतिहास को सुधारने का अर्थ इतिहास को सुविधानुसार लिखना नहीं है। यदि पहले किसी दौर में भारतीय उपलब्धियों को कम करके दिखाया गया, तो वह गलती थी। लेकिन आज यदि किसी दूसरे दौर की जटिलताओं, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और राजनीतिक वास्तविकताओं को केवल इसलिए हटा दिया जाए कि वे वर्तमान विचारधारा के अनुकूल नहीं हैं, तो वह भी इतिहास के साथ न्याय नहीं होगा।


NCERT की नई किताब ने कम से कम एक जरूरी बहस को फिर जीवित कर दिया है—बच्चों को केवल यह क्यों बताया जाए कि भारत पर किसने शासन किया? उन्हें यह भी बताया जाना चाहिए कि भारत ने किन परिस्थितियों में प्रतिरोध किया, क्या बचाया, क्या बनाया और समय के साथ स्वयं को कैसे पुनर्गठित किया।


इतिहास का उद्देश्य किसी समुदाय को दोषी ठहराना या किसी समुदाय को महिमामंडित करना नहीं होना चाहिए। उसका उद्देश्य सच को उसके पूरे संदर्भ, प्रमाण और जटिलता के साथ सामने रखना होना चाहिए।


भारत की नई पीढ़ी को न ही हीनता का इतिहास चाहिए, न अंधा गौरव।


उसे ऐसा इतिहास चाहिए जिसमें पराजय भी दर्ज हो, प्रतिरोध भी; संघर्ष भी दर्ज हो, सहअस्तित्व भी; विनाश भी दर्ज हो और पुनर्निर्माण भी।


यही इतिहास का वास्तविक पुनर्पाठ होगा—और शायद यही वह जगह है जहां भारत अपनी स्मृति को किसी राजनीतिक खांचे से निकालकर तथ्य, प्रमाण और आत्मबोध के आधार पर देखना शुरू कर सकता है।

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