बौद्धिक प्रतिकार | प्रणव बजाज
इंदौर। नगर निगम के राजस्व विभाग में भ्रष्टाचार और सिस्टम की निगरानी पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। जोन-2 के वार्ड 69 में कागजों पर करोड़ों रुपए की वसूली दिखाई गई, लेकिन बैंक खाते में उसका एक छोटा हिस्सा ही पहुंचने का मामला सामने आया है। उपलब्ध जांच दस्तावेजों के अनुसार पोर्टल पर ₹2 करोड़ 46 लाख 29 हजार 999 रुपए की रसीदें दर्ज की गईं, जबकि बैंक मिलान में सिर्फ ₹16 लाख 70 हजार 252 रुपए की राशि दिखाई दी। यानी दोनों के बीच ₹2 करोड़ 29 लाख 59 हजार 747 रुपए का अंतर है।
सवाल सीधा है—अगर रसीद काटी गई तो पैसा गया कहां?
मामले में संपत्तिकर, जलकर और कचरा शुल्क की वसूली के नाम पर पीओएस मशीनों से रसीदें जनरेट करने और उन्हें सिस्टम में अपलोड करने का आरोप है। सार्वजनिक रिपोर्टिंग में भी जोन-2 की 232 संदिग्ध रसीदों से करीब ₹2 करोड़ की राशि निगम खजाने में जमा नहीं होने का मामला सामने आया है।
जांच से जुड़े विवरण के अनुसार बिल कलेक्टर संयम नीमा ने पूछताछ में यह स्वीकार किया कि कुछ रसीदों के बदले नागरिकों से वास्तविक राशि प्राप्त नहीं हुई थी और कागजी वसूली का इस्तेमाल विभागीय बैठकों में राजस्व संग्रह का आंकड़ा बढ़ाकर दिखाने के लिए किया गया। यदि जांच में यह तथ्य प्रमाणित होता है तो मामला केवल लापरवाही का नहीं, बल्कि राजस्व रिकॉर्ड में जानबूझकर हेरफेर और सरकारी हिसाब-किताब को गुमराह करने का गंभीर प्रकरण बन सकता है।
प्रभारी सहायक राजस्व अधिकारी अखिलेश मालवीय पर भी निगरानी और मिलान में गंभीर चूक के सवाल हैं। इसी विभाग में पहले 354 संपत्तियों के फर्जी नामांतरण का मामला सामने आ चुका है, जिसमें जांच के बाद कर्मचारियों पर कार्रवाई और बाद में साइबर सेल की एफआईआर की रिपोर्ट सामने आई।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जोन-2 में ही अगर रसीद, पोर्टल और बैंक खाते का हिसाब इतना अलग निकल सकता है, तो नगर निगम के बाकी 21 जोनों में कितनी वसूली वास्तव में बैंक तक पहुंची और कितनी सिर्फ सिस्टम में दिखाई गई?
निगम को सभी 22 जोनों की रसीद-पोर्टल-बैंक मिलान ऑडिट करानी चाहिए। क्योंकि सवाल ₹2.30 करोड़ के अंतर का ही नहीं है—सवाल उस डिजिटल व्यवस्था का है, जिस पर शहर के करोड़ों रुपए के राजस्व की निगरानी टिकी है।

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