प्रणव बजाज
छिंदवाड़ा कफ सिरप कांड ने मध्यप्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था और प्रशासनिक जवाबदेही पर ऐसा सवाल खड़ा कर दिया है, जिसका जवाब सरकार को देना होगा। दूषित कफ सिरप से बच्चों की मौत के बाद जिन दो ड्रग इंस्पेक्टरों पर कार्रवाई हुई, उनकी बहाली ने पूरे मामले को फिर सुर्खियों में ला दिया है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार इस त्रासदी में कम से कम 19 बच्चों की मौत हुई थी और जांच में Coldrif सिरप में खतरनाक रसायन Diethylene Glycol की मौजूदगी सामने आई थी।
सबसे चौंकाने वाला सवाल यह है कि जब सरकार ने अधिकारियों को निलंबित किया था तो उस कार्रवाई का आधार क्या था और अब बहाली किस जांच या रिपोर्ट के आधार पर हुई?
अक्टूबर 2025 में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के निर्देश पर छिंदवाड़ा के ड्रग इंस्पेक्टर गौरव शर्मा और जबलपुर के ड्रग इंस्पेक्टर शरद कुमार जैन को निलंबित किया गया था। उस समय सरकार की ओर से दवा निगरानी में लापरवाही पर सख्त कार्रवाई का संदेश दिया गया था।
अब यदि स्वास्थ्य मंत्री को उन्हीं अधिकारियों की बहाली की जानकारी नहीं है, तो सवाल और गंभीर है—स्वास्थ्य विभाग में इतने संवेदनशील फैसले आखिर कौन ले रहा है?
एक तरफ उन परिवारों के घरों में बच्चों की तस्वीरें रह गईं, दूसरी तरफ जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया पर ही सवाल खड़े हो रहे हैं। क्या निलंबन केवल तत्काल राजनीतिक-प्रशासनिक प्रतिक्रिया थी? क्या विभागीय जांच पूरी हुई? क्या किसी अधिकारी की जिम्मेदारी अंतिम रूप से तय हुई? और यदि नहीं, तो बहाली क्यों?
मध्यप्रदेश सरकार को इन सवालों का स्पष्ट जवाब देना चाहिए। मासूमों की मौत के बाद ‘मुझे खबर नहीं’ कहकर जवाबदेही खत्म नहीं हो सकती।
अब असली सवाल यही है—दवा की गुणवत्ता पर निगरानी रखने वाली व्यवस्था में चूक हुई तो जिम्मेदार कौन है, और अगर चूक नहीं हुई तो फिर निलंबन किस बात का था?

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