नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने नाबालिग पत्नी के साथ यौन संबंध के मामले में अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत विवाह होने से POCSO एक्ट और भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत आपराधिक जिम्मेदारी खत्म नहीं होती। कोर्ट ने 16 साल की लड़की से विवाह करने वाले आरोपी की FIR रद्द करने की मांग खारिज कर दी।
जस्टिस संजीव नरूला ने कहा कि विवाह किसी बच्चे की उम्र नहीं बदल देता। अदालत के मुताबिक, जो व्यक्ति विवाह से पहले 16 साल का है, वह विवाह के बाद भी 16 साल का ही रहता है। POCSO कानून में 18 वर्ष से कम उम्र के व्यक्ति को बच्चा माना गया है और इस उम्र में यौन संबंध के लिए सहमति को कानूनी सहमति नहीं माना जाता।
मामले में लड़की की शादी दिसंबर 2024 में हुई थी, जब उसकी उम्र करीब 16 साल 3 महीने थी, जबकि आरोपी की उम्र लगभग 28 वर्ष थी। बाद में गर्भावस्था के दौरान सरकारी अस्पताल में इलाज के समय उसकी उम्र सामने आई और पुलिस को सूचना दी गई। FIR में BNS की धारा 64(1) और POCSO की धारा 6 लगाई गई थी।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने विवाह की वैधता पर अंतिम फैसला नहीं दिया है। उसका निर्णय इस सीमित सवाल पर है कि विवाह को आधार बनाकर नाबालिग के साथ यौन संबंध को POCSO या BNS के दायरे से बाहर नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि व्यक्तिगत कानून ऐसा अपवाद नहीं बना सकता, जिसे संसद ने आपराधिक कानून में नहीं दिया है।

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