संपादकीय | प्रणव बजाज
नेतृत्व को केवल भाषणों या लोकप्रिय नारों से नहीं, बल्कि इस बात से समझा जा सकता है कि कोई विचार कितनी दूर तक नीति, संस्थान और रोजमर्रा की जिंदगी में दिखाई देता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व के पिछले वर्षों को इसी कसौटी पर देखने पर एक महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है—विजन को मिशन और मिशन को बड़े पैमाने पर लागू करने की कोशिश।
डिजिटल इंडिया इसका बड़ा उदाहरण है। UPI की शुरुआत 2016 में हुई थी। वित्त मंत्रालय के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में UPI पर 24,162 करोड़ से अधिक लेन-देन हुए, जिनका मूल्य करीब ₹314 लाख करोड़ रहा। जुलाई 2026 तक 741 बैंक UPI से जुड़े थे।
यह केवल तकनीक की कहानी नहीं है। असली बदलाव तब दिखाई देता है जब कोई तकनीक करोड़ों लोगों की रोजमर्रा की आदत बन जाती है। इसी तरह Digital Public Infrastructure ने बैंकिंग, भुगतान और सरकारी सेवाओं को डिजिटल प्लेटफॉर्म से जोड़ने की दिशा में बड़ा विस्तार किया है। सरकार के अनुसार जून 2026 तक 2.21 लाख ग्राम पंचायतें BharatNet के तहत सेवा के लिए तैयार थीं।
आत्मनिर्भरता का मतलब सिर्फ नारा नहीं
‘आत्मनिर्भर भारत’ को यदि Gen Z के नजरिए से देखें तो इसका सबसे उपयोगी पाठ निर्भरता से क्षमता की ओर बढ़ना है। सरकार ने इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर, रक्षा उत्पादन और AI जैसे क्षेत्रों में घरेलू क्षमता बढ़ाने की नीतियां आगे बढ़ाई हैं। अगस्त 2026 में सरकार ने IndiaAI और Semiconductor मिशनों के जरिए तकनीकी आत्मनिर्भरता को आगे बढ़ाने की दिशा में कदमों की जानकारी दी।
लेकिन यहां एक जरूरी सवाल भी है—सरकारी लक्ष्य और वास्तविक उपलब्धि में कितना अंतर है? किसी भी नेतृत्व मॉडल को समझने के लिए केवल घोषणाएं नहीं, बल्कि रोजगार, उत्पादकता, निजी निवेश, निर्यात और आम नागरिक की आय जैसे परिणामों को भी लगातार मापना होगा।
Gen Z के लिए सबसे बड़ा सबक: लंबी दौड़ की सोच
आज की युवा पीढ़ी तत्काल परिणाम चाहती है। डिजिटल दुनिया ने कुछ सेकंड में सूचना और कुछ मिनट में सेवा उपलब्ध करा दी है। ऐसे दौर में किसी बड़े संस्थागत बदलाव की सफलता वर्षों में दिखाई देती है।
मोदी स्वयं कई मौकों पर दीर्घकालिक सोच, तकनीक और आत्मनिर्भरता को विकास के प्रमुख आधारों के रूप में रखते रहे हैं। फरवरी 2026 में एक संबोधन में उन्होंने राष्ट्र निर्माण को अल्पकालिक सोच के बजाय दीर्घकालिक दृष्टि, धैर्य और समय पर फैसलों से जोड़कर प्रस्तुत किया।
यही बात व्यक्तिगत जीवन पर भी लागू होती है—विजन बिना एक्शन कल्पना है और एक्शन बिना विजन केवल व्यस्तता।
उत्तर प्रदेश का प्रयोग भी इसी बहस का हिस्सा
उत्तर प्रदेश में एक्सप्रेसवे, औद्योगिक गलियारों, हवाई अड्डों और निवेश परियोजनाओं को विकास के प्रमुख आधार के रूप में प्रस्तुत किया गया है। केंद्र और राज्य सरकारें इसे ‘डबल इंजन’ मॉडल से जोड़ती हैं। लेकिन किसी भी राज्य के विकास का वास्तविक मूल्यांकन केवल सड़कों या निवेश प्रस्तावों से नहीं किया जा सकता। रोजगार, प्रति व्यक्ति आय, औद्योगिक उत्पादन, शिक्षा, स्वास्थ्य और क्षेत्रीय असमानता जैसे संकेतक भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
यानी नेतृत्व के किसी मॉडल की समीक्षा में दावे और परिणाम दोनों को साथ देखना जरूरी है।
Gen Z के लिए पांच व्यावहारिक सीख
मोदी के सार्वजनिक जीवन और सरकार की कार्यशैली से युवा नेतृत्व के संदर्भ में कुछ व्यवहारिक प्रश्न निकाले जा सकते हैं—
पहला—लक्ष्य बड़ा रखिए। छोटी शुरुआत बड़े उद्देश्य को रोकती नहीं है।
दूसरा—तकनीक को साधन बनाइए। UPI और Digital Public Infrastructure का विस्तार दिखाता है कि सही तकनीक बड़े पैमाने पर व्यवहार बदल सकती है।
तीसरा—लगातार काम करने की आदत विकसित कीजिए। किसी भी बड़े परिणाम के पीछे निरंतरता होती है, केवल शुरुआती उत्साह नहीं।
चौथा—आत्मनिर्भरता को व्यक्तिगत कौशल से जोड़िए। नौकरी तलाशने के साथ उद्यमिता, AI, डिजिटल कौशल और नवाचार को भी विकल्प के रूप में देखना जरूरी है। सरकार ने अगस्त 2026 में एक वर्ष में एक करोड़ युवाओं को AI कौशल देने का लक्ष्य भी घोषित किया है।
पांचवां—हर दावे को परिणाम की कसौटी पर परखिए। यही लोकतांत्रिक समाज में नागरिक और युवा नेतृत्व की सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।
आखिरकार किसी भी नेता की सबसे बड़ी विरासत केवल उसके कार्यकाल में बने प्रोजेक्ट नहीं होते। असली सवाल यह होता है कि उसने संस्थाओं को कितना मजबूत किया, युवाओं को कितने अवसर मिले और देश की अगली पीढ़ी को अपने भविष्य को आकार देने के कितने साधन मिले।
Gen Z के लिए शायद सबसे उपयोगी संदेश यही है—सिर्फ विजन देखकर प्रभावित मत होइए; उसे एक्शन में बदलिए, परिणाम मापिए और जरूरत पड़ने पर दिशा भी बदलिए।

Post a Comment