भारत और यूरोपीय संघ के बीच मुक्त व्यापार समझौते यानी India-EU FTA में ऑटोमोबाइल सेक्टर को लेकर बड़ा बदलाव सामने आया है। समझौते के तहत पहले साल यूरोपीय बाजार में 2.5 लाख भारतीय मूल की यात्री कारों को सिर्फ 8% शुल्क पर प्रवेश मिलेगा। यह संख्या 10वें साल तक बढ़कर 4 लाख कार सालाना हो जाएगी। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, इस रियायती शुल्क को अगले पांच वर्षों में घटाकर शून्य किया जाना है।
कौन सी भारतीय कारों को फायदा?
इसका सबसे बड़ा फायदा उन कंपनियों और मॉडलों को मिल सकता है जो भारत में उत्पादन कर यूरोप को निर्यात करते हैं। यानी केवल भारतीय कंपनी का होना पर्याप्त नहीं; कार का समझौते में तय भारतीय मूल/स्थानीय वैल्यू-एडिशन नियमों को पूरा करना महत्वपूर्ण होगा।
इससे भारत में उत्पादन करने वाली कंपनियों को यूरोप में कीमत के स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनने का मौका मिल सकता है। खासकर छोटी कारों, प्रीमियम मॉडल और इलेक्ट्रिक/हाइब्रिड वाहनों के लिए निर्यात का आधार मजबूत हो सकता है।
भारत को कितना फायदा?
फायदा सिर्फ कार बिक्री तक सीमित नहीं रहेगा। ज्यादा निर्यात का मतलब भारत में मैन्युफैक्चरिंग, ऑटो पार्ट्स, रोजगार और सप्लाई चेन में बढ़ोतरी हो सकती है। EU के साथ FTA में व्यापक रूप से भारतीय निर्यातकों के लिए बाजार पहुंच बढ़ाने का लक्ष्य है। यूरोपीय आयोग के अनुसार समझौते से EU के 96.6% वस्तु निर्यात पर शुल्क समाप्त या कम होंगे और यूरोपीय निर्यातकों को सालाना करीब €4 अरब तक शुल्क बचत हो सकती है।
लेकिन एक बड़ा सवाल भी
इस समझौते का फायदा हर भारतीय कार को अपने आप नहीं मिलेगा। कोटा, मूल-देश के नियम, तकनीकी मानक और यूरोपीय बाजार की मांग तय करेगी कि वास्तव में कितनी कारें इस रियायत का लाभ उठा पाती हैं। इसलिए 2.5 लाख का आंकड़ा संभावित वार्षिक रियायती प्रवेश की सीमा है, यह जरूरी नहीं कि इतनी कारें वास्तव में हर साल बिकें।
साफ है—भारत के लिए यह समझौता यूरोप को सिर्फ बाजार नहीं, बल्कि भारतीय ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरिंग का अगला बड़ा एक्सपोर्ट हब बनाने का मौका दे सकता है। साथ ही असली परीक्षा यह होगी कि भारतीय कंपनियां इस रियायती कोटे का कितना इस्तेमाल कर पाती हैं।

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