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मोहन सरकार का कर्ज कितना बढ़ेगा, जनता पर कितना पड़ेगा बोझ?

 


₹5.42 लाख करोड़ के पार देनदारी, सालाना ब्याज में जा रहा हजारों करोड़; कर्ज के बदले जमीन पर कितना काम?


विशेष रिपोर्ट | प्रणव बजाज


मध्यप्रदेश सरकार की कर्ज लेने की रफ्तार ने एक बार फिर प्रदेश की वित्तीय स्थिति पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। सितंबर में ₹3,600 करोड़ के बाद अब सरकार ने फिर ₹2,500 करोड़ की बाजार उधारी की है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक राज्य पर कुल देनदारी का आंकड़ा ₹5.42 लाख करोड़ से ज्यादा पहुंच चुका है। लेकिन असली सवाल सिर्फ कर्ज की रकम नहीं, बल्कि यह है कि इस कर्ज से जनता को जमीन पर कितना फायदा मिल रहा है।



2026-27 के बजट में सरकार ने ₹1,06,190 करोड़ की सकल उधारी का अनुमान रखा है। इसी साल ₹34,437 करोड़ पुराने कर्ज की अदायगी के लिए भी रखने होंगे। यानी नया पैसा आने के साथ पुरानी देनदारी चुकाने का सिलसिला भी जारी रहेगा।


सबसे बड़ा दबाव ब्याज का है। बजट विश्लेषण के मुताबिक 2026-27 में वेतन, पेंशन और ब्याज सहित प्रतिबद्ध खर्च ₹1,37,826 करोड़ है, जो राजस्व प्राप्तियों का करीब 45 प्रतिशत है। अकेले ब्याज भुगतान का हिस्सा करीब 10.9 प्रतिशत है। मतलब सरकार की कमाई का बड़ा हिस्सा ऐसा है जिसे विकास के बजाय पुरानी देनदारी निभाने में लगाना पड़ता है।


सरकार का तर्क है कि उधार विकास और पूंजीगत परियोजनाओं के लिए लिया जा रहा है। बजट में 2026-27 के लिए ₹78,920 करोड़ पूंजीगत व्यय रखा गया है। लेकिन सवाल यह है कि बजट में घोषित रकम और वास्तव में जमीन पर हुए काम में कितना अंतर है। 2025-26 में पूंजीगत व्यय बजट अनुमान से करीब 11 प्रतिशत कम रहने का संशोधित अनुमान है।


CAG के रिकॉर्ड में 31 मार्च 2025 तक विभिन्न योजनाओं के SNA खातों में ₹9,888.74 करोड़ की राशि खर्च न होने की बात दर्ज है। यह रकम सीधे तौर पर कर्ज की रकम नहीं कही जा सकती, लेकिन इससे सरकारी धन के उपयोग की गति और निगरानी पर सवाल जरूर उठते हैं।


अब जनता के सामने सीधा सवाल है—अगर हर साल हजारों करोड़ का नया कर्ज लिया जा रहा है तो उसकी कीमत कौन चुकाएगा? ब्याज और मूलधन अंततः सरकार की आय से ही जाएंगे, और सरकार की आय का बड़ा स्रोत जनता से मिलने वाला कर है।


इसलिए असली हिसाब सिर्फ यह नहीं होना चाहिए कि मोहन सरकार ने कितना कर्ज लिया, बल्कि यह भी सामने आना चाहिए कि उस कर्ज से कितनी सड़कें बनीं, कितने पुल पूरे हुए, कितनी सिंचाई क्षमता बढ़ी, कितने अस्पताल-स्कूल बने और कितनी परियोजनाओं में लागत बढ़ी या काम अटका।


कर्ज विकास का साधन हो सकता है, लेकिन जनता का सवाल जायज है—कर्ज बढ़ रहा है तो उसके बदले जनता की संपत्ति और सुविधाएं भी उसी अनुपात में बढ़ रही हैं या नहीं?

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