महू में सरकारी पैथोलॉजिस्ट के नाम से दूर-दराज के शहरों में रिपोर्ट जारी होने का मामला; अब इंदौर की लैबों की जांच की मांग
प्रणव बजाज
इंदौर जिले की निजी पैथोलॉजी व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में है। महू में पदस्थ पैथोलॉजिस्ट डॉ. मनीष पंत के नाम और उनकी विशेषज्ञ योग्यता का इस्तेमाल देवास, नीमच, मनासा और मंदसौर जैसे शहरों में संचालित निजी पैथोलॉजी सेंटरों से जुड़ा होने के आरोपों ने स्वास्थ्य विभाग की निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। उपलब्ध विभागीय दस्तावेज में नीमच और देवास से डॉ. पंत के नाम से लगभग एक ही समय जांच रिपोर्ट जारी होने का उल्लेख है, जबकि दोनों शहरों के बीच करीब 250 किलोमीटर की दूरी बताई गई है।
मामले में महू सिविल अस्पताल के प्रभारी डॉ. अमित सोनी द्वारा डॉ. मनीष पंत को कारण बताओ नोटिस जारी किए जाने की जानकारी सामने आई है। विभाग ने स्पष्टीकरण मांगा है और जवाब संतोषजनक नहीं मिलने पर नियमानुसार कार्रवाई की बात कही है।
लेकिन सवाल सिर्फ महू या एक डॉक्टर तक सीमित नहीं है। इंदौर शहर के खजराना, आजाद नगर, चंदन नगर सहित कई इलाकों में संचालित निजी लैबों की वास्तविक निगरानी व्यवस्था की जांच भी जरूरी है। क्या प्रत्येक सेंटर पर पंजीकृत पैथोलॉजिस्ट वास्तव में उपलब्ध रहता है? रिपोर्ट पर हस्ताक्षर करने वाला विशेषज्ञ जांच प्रक्रिया की निगरानी करता है? क्या एक ही मरीज की एक ही जांच अलग-अलग लैबों में कराने पर रिपोर्टों में अंतर की शिकायतों की जांच कभी व्यवस्थित रूप से हुई?
सबसे गंभीर सवाल यह है कि यदि किसी सरकारी अस्पताल में पदस्थ विशेषज्ञ के नाम या डिग्री का इस्तेमाल दूर-दराज के निजी सेंटरों के लिए किया जा रहा था, तो स्वास्थ्य विभाग को इसकी जानकारी कब हुई?
सीएमएचओ डॉ. माधव प्रसाद हासानी की भूमिका को लेकर भी कुछ लोगों ने संरक्षण के आरोप लगाए हैं। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। इसलिए जांच का दायरा केवल एक डॉक्टर या एक लैब तक सीमित न रहकर संबंधित सेंटरों के पंजीयन, विशेषज्ञ की वास्तविक उपस्थिति, डिजिटल हस्ताक्षर, रिपोर्ट जारी होने के समय, जांच प्रक्रिया और शुल्क व्यवस्था तक पहुंचना चाहिए।
क्योंकि पैथोलॉजी रिपोर्ट महज कागज नहीं होती—कई बार उसी कागज के आधार पर मरीज का इलाज तय होता है।

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