इंदौर। कारोबार में कई बार ऐसा होता है कि आज बैंक से पैसा निकाला, कारोबार चलाया, रकम वापस जमा की और फिर जरूरत पड़ने पर उसी सीमा से दोबारा पैसा निकाल लिया। इसे मोटे तौर पर रिवॉल्विंग क्रेडिट कहा जाता है। यह सुविधा नकदी की कमी से जूझ रहे कारोबार के लिए सहारा बन सकती है, लेकिन गलत तरीके से इस्तेमाल होने पर यही व्यवस्था कर्ज के चक्र में भी फंसा सकती है।
रिवॉल्विंग क्रेडिट में बैंक एक तय क्रेडिट लिमिट उपलब्ध कराता है। ग्राहक जरूरत के हिसाब से रकम निकाल सकता है और वापस चुकाने पर उपलब्ध सीमा फिर बढ़ जाती है। आम तौर पर ब्याज इस्तेमाल की गई रकम पर लगता है, पूरी स्वीकृत सीमा पर नहीं।
मसलन, किसी कारोबारी को ₹10 लाख की क्रेडिट सीमा मिली। उसने ₹6 लाख निकाले और कुछ समय बाद ₹4 लाख वापस जमा कर दिए। अब उपलब्ध सीमा बढ़कर ₹8 लाख हो सकती है। लेकिन अगर कारोबार की कमाई से कर्ज घटने के बजाय बार-बार उसी सीमा का इस्तेमाल होता रहे, तो समस्या शुरू हो सकती है।
असल खेल यहीं है। अगर पुराना कर्ज चुकाने के लिए कारोबार की वास्तविक कमाई पर्याप्त नहीं है और लगातार नई उधारी ली जा रही है, तो नकदी का संकट छिप तो सकता है, खत्म नहीं होता। ब्याज, शुल्क और समय पर भुगतान न होने की स्थिति में अतिरिक्त लागत बोझ बढ़ा सकती है।
इसलिए रिवॉल्विंग क्रेडिट को कमाई का विकल्प नहीं, नकदी प्रबंधन का साधन समझना चाहिए। कारोबार की वास्तविक कैश फ्लो, ब्याज दर, शुल्क, भुगतान की शर्तें और कुल कर्ज का नियमित हिसाब रखना जरूरी है। सुविधा तभी फायदेमंद है जब वह कारोबार की जरूरत पूरी करे और समय के साथ कर्ज पर निर्भरता घटे।

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