इंदौर। बैंक एफडी या पारंपरिक निवेश विकल्पों से ज्यादा रिटर्न का दावा करने वाले बॉन्ड इन दिनों निवेशकों का ध्यान खींच रहे हैं। 11 से 15% तक रिटर्न देखकर निवेश आकर्षक लग सकता है, लेकिन ज्यादा ब्याज दर अक्सर ज्यादा जोखिम का संकेत भी होती है। SEBI के मुताबिक सामान्य तौर पर कम क्रेडिट रेटिंग वाले बॉन्ड में जोखिम अधिक और संभावित रिटर्न भी ज्यादा हो सकता है।
सबसे बड़ा खतरा डिफॉल्ट का है। बॉन्ड खरीदकर निवेशक वास्तव में जारीकर्ता को पैसा उधार देता है। यदि कंपनी आर्थिक संकट में फंसती है और ब्याज या मूलधन चुकाने में असमर्थ होती है, तो निवेशक को नुकसान हो सकता है। सरकारी प्रतिभूतियों की तुलना में कॉरपोरेट बॉन्ड में क्रेडिट जोखिम अलग स्तर का होता है।
रेटिंग देखकर ही फैसला न करें। AAA, AA जैसी रेटिंग जोखिम का आकलन करने में मदद करती है, लेकिन यह पैसा लौटने की गारंटी नहीं है। निवेश से पहले जारीकर्ता की वित्तीय स्थिति, कर्ज, ब्याज भुगतान का रिकॉर्ड, बॉन्ड की अवधि और सुरक्षा/गारंटी की शर्तें पढ़ना जरूरी है।
लिक्विडिटी भी बड़ा सवाल है। जरूरत पड़ने पर हर बॉन्ड आसानी से सही कीमत पर बिक जाए, यह जरूरी नहीं। ब्याज दरों में बदलाव से बॉन्ड की बाजार कीमत भी प्रभावित हो सकती है।
इसलिए सिर्फ “15% रिटर्न” देखकर पैसा लगाना समझदारी नहीं। पहले पूछें—इतना ज्यादा रिटर्न क्यों दिया जा रहा है, पैसा कौन ले रहा है, उसकी कमाई और कर्ज की स्थिति क्या है और डिफॉल्ट होने पर निवेशक के पास क्या सुरक्षा है?
याद रखें: ज्यादा रिटर्न का मतलब अक्सर ज्यादा जोखिम भी होता है। अपनी पूरी बचत किसी एक बॉन्ड में लगाने के बजाय जोखिम, अवधि और अपनी वित्तीय जरूरत को समझकर ही फैसला लें।

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