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एक अफसर, इतनी कुर्सियां कि ऑफिस में जगह कम पड़ जाए! हाईकोर्ट पहुंचा मामला, सरकार ने बदली व्यवस्था

 

जनसंपर्क से परिवहन तक जिम्मेदारियों का विस्तार; STA की अध्यक्षता पर हाईकोर्ट में सवाल और बाद में व्यवस्था में बदलाव—अब सरकार बताए, यह ‘कॉम्बो पैक’ कब तक?



विशेष रिपोर्ट | प्रणव बजाज


भोपाल। मध्यप्रदेश की नौकरशाही में इन दिनों कुर्सियों का भी अपना गणित है। कहीं 68 IAS पद खाली, तो कहीं एक ही अधिकारी के पास जिम्मेदारियों का ऐसा कॉम्बो कि विभाग गिनते-गिनते कैलकुलेटर भी आराम मांग ले!


मनीष सिंह का मामला इसी प्रशासनिक गणित का दिलचस्प उदाहरण बनकर सामने आता है। फरवरी 2026 में उन्हें आयुक्त जनसंपर्क और मध्यप्रदेश माध्यम की जिम्मेदारी मिली। इसके साथ परिवहन से जुड़े महत्वपूर्ण दायित्व भी उनके पास रहे। यानी एक तरफ सरकार का संदेश जनता तक पहुंचाने की जिम्मेदारी और दूसरी तरफ सड़कों पर दौड़ते वाहनों से जुड़ा पूरा सरकारी तंत्र।


एक हाथ में प्रेस नोट, दूसरे में परिवहन की फाइल—सरकारी व्यवस्था इसे ‘मल्टीटास्किंग’ कहती है या ‘मल्टी-चार्जिंग’, यह सरकार जाने!


कुर्सी बढ़ी तो सवाल भी बढ़े


मामला सिर्फ विभागों की संख्या तक नहीं रुका। State Transport Authority यानी STA के अध्यक्ष पद को लेकर मनीष सिंह की नियुक्ति को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। याचिकाकर्ता ने उनकी अन्य परिवहन जिम्मेदारियों के साथ इस नियुक्ति पर कानूनी सवाल उठाए। अदालत ने संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था।


यह ध्यान रखना जरूरी है कि नोटिस जारी होना दोष सिद्ध होना नहीं है।


लेकिन कहानी में व्यंग्य का मसाला यहीं से आता है—जब एक ही प्रशासनिक छत के नीचे इतनी सारी कुर्सियां आ जाएं कि अदालत तक पूछे कि बैठने की व्यवस्था ठीक है या नहीं!


और फिर अगस्त 2026 में सरकार ने STA की अध्यक्षता की व्यवस्था में बदलाव किया। नई व्यवस्था में Additional Chief Secretary या Principal Secretary स्तर के अधिकारी को अध्यक्ष बनाने और परिवहन आयुक्त को सदस्य रखने का प्रावधान किया गया।


अब सवाल पूछना तो बनता है—


व्यवस्था पहले बिल्कुल ठीक थी तो बदली क्यों?


और अगर व्यवस्था में सुधार जरूरी था तो सुधार की जरूरत महसूस होने में इतना समय क्यों लगा?


चेकपोस्ट की फाइल भी अदालत पहुंची


परिवहन से जुड़े एक दूसरे मामले में अप्रैल 2026 में हाईकोर्ट ने राज्य द्वारा दिए गए undertakings और इंटर-स्टेट चेकपोस्ट बंद किए जाने के मुद्दे पर राज्य को पुराने undertaking का पालन करने तथा बंद चेकपोस्ट बहाल करने का निर्देश दिया।


फिर वही सवाल—


इतनी बड़ी-बड़ी कुर्सियां, इतने बड़े-बड़े प्रभार और आखिर में अदालत से ‘फाइल फिर से देखिए’ का आदेश!


यहां भी किसी अधिकारी को भ्रष्ट कहना सही नहीं होगा। अदालत का आदेश प्रशासनिक अनुपालन से संबंधित था।


लेकिन जनता का सवाल सीधा है—


जब विभाग में इतने बड़े अधिकारी बैठे हैं तो ऐसी स्थिति अदालत तक पहुंचने से पहले क्यों नहीं सुलझती?


68 कुर्सियां खाली, कॉम्बो पैक चालू!


अब इस पूरे मामले को 68 रिक्त IAS पदों से जोड़कर देखिए।


एक तरफ सरकार के आंकड़ों में स्वीकृत पदों और वास्तविक पदस्थापना के बीच अंतर।


दूसरी तरफ कई अधिकारियों को अतिरिक्त प्रभार।


और तीसरी तरफ एक अधिकारी के पास विभागों और संस्थाओं का लंबा दायरा।


यह कौन-सा प्रशासनिक मॉडल है—‘एक अधिकारी, एक विभाग’ पुरानी स्कीम हो गई क्या?


क्या नई सरकारी स्कीम है—


“एक अधिकारी लो, कई विभाग मुफ्त पाओ!”


मोहन सरकार से चार सीधे सवाल


सरकार को अब जनता को चार जवाब देने चाहिए।


पहला— अतिरिक्त प्रभार की अधिकतम समयसीमा क्या है?


दूसरा— एक IAS अधिकारी को एक साथ कितनी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी जा सकती हैं?


तीसरा— बहु-प्रभार वाले अधिकारियों की लंबित फाइलों और निर्णयों की निगरानी कौन करता है?


चौथा— STA की व्यवस्था बदलने का विस्तृत प्रशासनिक कारण सरकार सार्वजनिक करेगी या नहीं?


रिकॉर्ड से सवाल, आरोप से नहीं


मनीष सिंह पर भ्रष्टाचार या पद के निजी लाभ के आरोप को बिना आधिकारिक जांच या न्यायिक निष्कर्ष के तथ्य की तरह लिखना उचित नहीं होगा।


लेकिन रिकॉर्ड पर सवाल पूछने के लिए किसी सनसनी की जरूरत भी नहीं।


कितने प्रभार? कितनी फाइलें? कितने न्यायिक मामले? कितने निर्णय? कितनी जवाबदेही?


इनका हिसाब सरकार के पास होना चाहिए।


क्योंकि मध्यप्रदेश में समस्या सिर्फ यह नहीं कि 68 IAS कुर्सियां खाली हैं।


असली व्यंग्य तो यह है—


कुर्सियां खाली हैं, मगर कुछ मेजों पर फाइलें बैठने की जगह नहीं छोड़ रहीं!


अब जनता देखना चाहती है कि सरकार इन कुर्सियों को कब भरती है और ‘कॉम्बो पैक प्रशासन’ की यह स्कीम कब खत्म होती है।

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