उज्जैन । बौद्धिक प्रतिकार
देवास रोड स्थित गीता भवन में चल रही तीन दिवसीय युवा धर्म संसद-2026 में शुक्रवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने युवाओं के सामने धर्म की अवधारणा को कर्मकांड से आगे रखते हुए उसके व्यवहारिक पक्ष पर विस्तार से बात की। 24 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से पहुंचे 1600 से अधिक युवाओं के बीच उन्होंने कहा कि धर्म को केवल पूजा, इच्छा पूर्ति, भय या लोभ से जोड़कर देखना सही नहीं है। उनके अनुसार धर्म जीवन के प्रारंभ से अंत तक साथ रहने वाला सिद्धांत है।
भागवत ने कहा कि ‘रिलिजन’ और धर्म एक ही चीज नहीं हैं। उनके मुताबिक धर्म मनुष्य को मुक्त करने वाली धारणा है, जबकि रिलिजन का संबंध किसी व्यवस्था या अनुशासन में बांधने से है। उन्होंने कहा कि भाषा और औपनिवेशिक प्रभाव के कारण भारत में धर्म के लिए ‘रिलिजन’ शब्द का इस्तेमाल बढ़ा, जिससे अवधारणा को लेकर भ्रम पैदा हुआ। कर्मकांड को उन्होंने धर्म का अभ्यास बताया, लेकिन पूरा धर्म नहीं।
उन्होंने कहा कि धर्म का आधार सत्य है और प्रकृति की विविधता को स्वीकार करना भी इसी का हिस्सा है। “हम सब एक हैं”—इस विचार को उन्होंने संवेदना से जोड़ा। उनका कहना था कि व्यक्ति अपनी बुद्धि से कमाए, अपने जीवन को आगे बढ़ाए, लेकिन उसकी कमाई और जीवनशैली से दूसरे को नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए। पूर्वजों द्वारा धर्मशालाएं और जनसेवा की व्यवस्थाएं खड़ी किए जाने का उदाहरण देते हुए उन्होंने कमाई के साथ समाज के प्रति जिम्मेदारी की बात रखी।
भागवत ने भारत को ‘धर्मप्राण देश’ बताते हुए कहा कि देश आर्थिक और सामरिक रूप से मजबूत बनेगा, लेकिन शक्ति ही उसका अंतिम लक्ष्य नहीं हो सकती। उन्होंने कहा कि भारत का उद्देश्य केवल स्वयं आगे बढ़ना नहीं, बल्कि “हम जिएंगे और सबको जिलाएंगे” की भावना के साथ दुनिया के लिए प्रेरणा बनना है।
उन्होंने भारतीय संदर्भ में ‘सेक्युलर’ शब्द की व्याख्या पर भी अपनी बात रखी। उनके अनुसार भारत में राज्य को किसी के साथ भेदभाव नहीं करना चाहिए और सभी का सम्मान करना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत ने संकट के समय लोगों की मदद की है और दुनिया के संघर्षों में अनावश्यक रूप से उलझने के बजाय मानवता के पक्ष में खड़े होने की परंपरा रही है।
युवाओं को संबोधित करते हुए भागवत ने कहा कि धर्म को केवल बुढ़ापे से जोड़ना गलत है। युवावस्था में ही जीवन, समाज और जिम्मेदारी के प्रश्नों पर विचार जरूरी है। उनका संदेश था कि भारतीय युवाओं का आचरण ऐसा हो जिससे दुनिया भारत से प्रेरणा ले।
सेवाज्ञ संस्थानम् द्वारा आयोजित इस संसद में धर्म, भारतीय संस्कृति, चरित्र निर्माण, सामाजिक जिम्मेदारी के साथ एआई, तकनीक, शिक्षा, रोजगार, पर्यावरण और राष्ट्र निर्माण जैसे समकालीन विषयों पर भी संवाद हो रहा है। पहले दिन ‘युवा पंचायत’ में विभिन्न राज्यों से आए युवाओं ने संस्कृति, शिक्षा, रोजगार, तकनीक और बदलते भारत की चुनौतियों पर अपने विचार रखे।

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