रियाद। दशकों तक तेल की बेशुमार कमाई के दम पर दुनिया की सबसे समृद्ध अर्थव्यवस्थाओं में शामिल रहा सऊदी अरब अब मध्य पूर्व के बढ़ते संघर्ष के बीच सुरक्षा और ऊर्जा आपूर्ति से जुड़ी चुनौतियों का सामना कर रहा है। खासकर यमन के हूती विद्रोहियों के हमलों ने सऊदी अरब की तेल सुविधाओं और क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ाई है।
हूती संगठन लंबे समय से सऊदी अरब को निशाना बनाता रहा है। मिसाइल और ड्रोन हमलों के जरिए तेल प्रतिष्ठानों और दूसरे महत्वपूर्ण ठिकानों को निशाना बनाने की घटनाएं पहले भी सामने आ चुकी हैं। ऐसे हमलों ने यह सवाल जरूर खड़ा किया कि विशाल रक्षा बजट और अत्याधुनिक हथियारों के बावजूद ऊर्जा ढांचे की सुरक्षा कितनी आसान है।
सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था में तेल और गैस क्षेत्र की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। इसलिए तेल उत्पादन, रिफाइनरी या निर्यात व्यवस्था पर बड़ा हमला केवल सऊदी अरब तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वैश्विक तेल बाजार में भी हलचल पैदा कर सकता है। तेल की कीमतों में उछाल का असर आयात पर निर्भर देशों पर भी पड़ता है।
हालांकि ‘सऊदी अरब अकेला पड़ गया’ या ‘सबने हाथ खड़े कर दिए’ कहना पूरी तरह तथ्यात्मक निष्कर्ष नहीं है। सऊदी अरब को अमेरिका समेत कई देशों से सुरक्षा सहयोग और सैन्य समर्थन मिलता रहा है। वहीं यमन संघर्ष को लेकर क्षेत्रीय कूटनीति में भी लगातार बदलाव हुए हैं।
आज सऊदी अरब के सामने चुनौती केवल हूती हमलों की नहीं, बल्कि तेल पर निर्भरता घटाने, आर्थिक विविधीकरण और बदलते मध्य पूर्व में अपनी सुरक्षा रणनीति को मजबूत करने की भी है। यही कारण है कि रियाद अब तेल की ताकत के साथ-साथ गैर-तेल अर्थव्यवस्था और क्षेत्रीय कूटनीति पर भी जोर दे रहा है।

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