मैनुअल सफाई पर अदालत की सख्त टिप्पणी, महाराष्ट्र की भेदभावपूर्ण नीति का प्रावधान रद्द; मृत सफाईकर्मियों के आश्रितों को 30 लाख रुपये मुआवजे का निर्देश
मुंबई। भारत विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में चांद तक पहुंचने का गौरव हासिल कर चुका है, लेकिन समाज में जाति आधारित भेदभाव और उससे जुड़ी अमानवीय प्रथाएं अब भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं। मैनुअल सफाई के मामले की सुनवाई करते हुए बांबे हाईकोर्ट ने इस सामाजिक वास्तविकता पर कड़ी टिप्पणी की है।
न्यायमूर्ति भारती डांगरे और न्यायमूर्ति मंजूषा देशपांडे की खंडपीठ ने कहा कि 21वीं सदी में भारत चांद के दूसरे छोर तक पहुंचने का गौरव महसूस करता है, लेकिन जाति व्यवस्था जैसी सामाजिक बुराई आज भी मौजूद है। अदालत के मुताबिक इसी व्यवस्था के कारण कुछ समुदायों के लोगों को पीढ़ियों से अमानवीय और खतरनाक सफाई कार्य करने के लिए मजबूर होना पड़ा है।
अदालत ने महाराष्ट्र सरकार की 2019 और 2025 की उन व्यवस्थाओं के एक प्रावधान को रद्द कर दिया, जिसमें निजी संस्थानों, सोसायटियों और ठेकेदारों के यहां काम करने वाले सफाईकर्मियों की मौत पर मुआवजे की जिम्मेदारी अलग तरीके से तय की गई थी। हाईकोर्ट ने इसे समानता के अधिकार के विपरीत माना।
महाराष्ट्र सरकार के अनुसार खतरनाक सफाई के दौरान हुई 81 मौतों की पहचान की गई और प्रत्येक परिवार को 10 लाख रुपये दिए गए। लेकिन हाईकोर्ट ने अब ऐसे मृतकों के आश्रितों को 30 लाख रुपये मुआवजा देने और छह महीने में सभी मामलों की पहचान पूरी करने का निर्देश दिया है। साथ ही मृत सफाईकर्मियों और मैनुअल सफाई से जुड़े परिवारों के पुनर्वास पर भी जोर दिया गया।
**अदालत की टिप्पणी ने एक बड़ा सवाल फिर सामने रखा है—तकनीक में तरक्की के बावजूद क्या सामाजिक बराबरी की मंजिल अभी भी अधूरी है?**

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