5 साल में 3,147 मौतें, ब्लैक स्पॉट बने जानलेवा; अतिक्रमण हटाने से पहले अनुमति किसने दी?
विशेष रिपोर्ट | प्रणव बजाज
इंदौर। शहर में सड़क सुरक्षा का सरकारी मॉडल अब एक बड़े सवाल के घेरे में है—क्या सड़क दुर्घटनाएं रोकने की जिम्मेदारी सिर्फ वाहन चालकों के चालान काटने तक सीमित हो गई है? आंकड़े बताते हैं कि इंदौर जिले में 2021 से 2025 के बीच 23,231 सड़क हादसों में 3,147 लोगों की मौत और 19,393 लोग घायल हुए। यानी पांच साल में औसतन हर दिन करीब 17 हादसे और लगभग दो मौतें। 2026 में 20 जून तक ही 2,367 हादसों में 287 लोगों की जान जा चुकी थी।
दूसरी तरफ ट्रैफिक कार्रवाई का आंकड़ा तेजी से बढ़ रहा है। 2024 में 66,941 चालान किए गए, 2025 में यह संख्या बढ़कर 1,61,511 हुई और जनवरी से जून 2026 के बीच ही 2,28,284 चालान किए जा चुके थे। सवाल यह नहीं कि चालान क्यों काटे जा रहे हैं—सवाल यह है कि इतनी बड़ी चालानी कार्रवाई के बावजूद सड़क दुर्घटनाओं और मौतों पर प्रभावी रोक क्यों नहीं लग रही?
ब्लैक स्पॉट पहले से चिन्हित, फिर भी मौतें जारी
2023 से जून 2026 तक शहर के चिन्हित ब्लैक स्पॉट पर 122 हादसों में 123 मौतें दर्ज हुईं। रालामंडल चौराहा पर 14 मौतें, जबकि लवकुश चौराहा और कैलोड़ कतर फाटा पर 11-11 मौतें दर्ज हुईं। ग्रामीण क्षेत्र के 15 ब्लैक स्पॉट पर 168 हादसों में 116 लोगों की मौत हुई। अर्जुन बड़ोद फ्लायओवर क्षेत्र में 19 मौतों का आंकड़ा सामने आया।
जब किसी स्थान को प्रशासन स्वयं ‘ब्लैक स्पॉट’ मान चुका है, तो अगला सवाल स्वाभाविक है—वहां दुर्घटना रोकने के लिए सड़क डिजाइन, रोशनी, संकेतक, डिवाइडर, स्पीड नियंत्रण, पैदल यात्री व्यवस्था और अतिक्रमण पर स्थायी कार्रवाई क्यों नहीं होती?
अतिक्रमण पहले बढ़ता है, कार्रवाई बाद में क्यों?
शहर में सड़क किनारे अतिक्रमण और अवैध निर्माण भी ट्रैफिक व्यवस्था को प्रभावित करते हैं। मई 2026 में नगर निगम ने छावनी क्षेत्र में सड़क विस्तार के लिए 124 अवैध संरचनाएं हटाईं।
यहीं व्यवस्था का दूसरा सवाल खड़ा होता है—अगर निर्माण अवैध था तो वह वर्षों तक खड़ा कैसे रहा? सड़क किनारे दुकान, पार्किंग, ठेला या अन्य कब्जा बढ़ने के बाद निगम कार्रवाई करता है, लेकिन कब्जा शुरू होने के समय निगरानी और रोकथाम की जिम्मेदारी किसकी थी?
सड़क की चौड़ाई कम होने, फुटपाथ पर कब्जे, गलत पार्किंग और यातायात बाधित होने के बाद कार्रवाई करना आसान है; लेकिन दुर्घटना से पहले समस्या को खत्म करना ही वास्तविक सड़क सुरक्षा है।
चालान बनाम सड़क सुरक्षा
पुलिस के आंकड़ों में चालानी कार्रवाई का विस्तार साफ दिखाई देता है। लेकिन सड़क सुरक्षा का वास्तविक पैमाना केवल यह नहीं हो सकता कि कितने चालान काटे गए। असली सवाल होना चाहिए—कितने हादसे कम हुए, कितनी मौतें टलीं और कितने ब्लैक स्पॉट सुरक्षित किए गए?
इंदौर पुलिस की ट्रैफिक हेल्पलाइन पर अवैध पार्किंग, रॉन्ग साइड, सड़क की समस्या और अन्य यातायात शिकायतें भी आती रही हैं। पुलिस ने हजारों शिकायतों के निराकरण का दावा किया है। इसके बावजूद ब्लैक स्पॉट पर लगातार मौतें यह सवाल छोड़ती हैं कि शिकायत के बाद केवल कार्रवाई दर्ज की जा रही है या समस्या का स्थायी समाधान भी हो रहा है?
प्रशासन की तीन एजेंसियां, जवाबदेही किसकी?
सड़क दुर्घटना केवल ड्राइवर की गलती का परिणाम मानकर मामला खत्म नहीं किया जा सकता। कई मामलों में पुलिस, नगर निगम, ट्रैफिक इंजीनियरिंग, सड़क निर्माण एजेंसी और जिला प्रशासन—सभी की भूमिका अलग-अलग होती है।
एक तरफ पुलिस चालान काटती है, दूसरी तरफ नगर निगम अतिक्रमण हटाता है और तीसरी तरफ सड़क एजेंसियां निर्माण एवं डिजाइन का काम करती हैं। लेकिन जब उसी जगह बार-बार हादसे होते हैं तो जवाबदेही किसकी तय होती है?
क्या इंदौर में ब्लैक स्पॉट की दुर्घटनाओं का विभागवार ऑडिट होता है? क्या प्रत्येक मौत के बाद सड़क की इंजीनियरिंग जांच होती है? कितने अधिकारियों या एजेंसियों को जिम्मेदार ठहराया गया? कितने अतिक्रमण हटाने के बाद दोबारा लौट आए? और चालान से प्राप्त राशि तथा सड़क सुरक्षा पर होने वाले खर्च का आपस में क्या संबंध है?
इन सवालों के जवाब सार्वजनिक होने चाहिए।
इंदौर को चालान की संख्या बढ़ाने वाला शहर नहीं, हादसों और मौतों की संख्या घटाने वाला शहर बनाने की जरूरत है। सड़क सुरक्षा की सफलता रसीदों की गिनती से नहीं, बची हुई जिंदगियों से तय होगी।

Post a Comment