प्रणव बजाज
भोपाल। मध्यप्रदेश की अफसरशाही में एक बार फिर सरकार बनाम प्रशासनिक अधिकार का सवाल सामने आया है। महिला एवं बाल विकास विभाग की आयुक्त रहीं 2012 बैच की आईएएस अधिकारी निधि निवेदिता का 5 सितंबर को तबादला हुआ और इसके कुछ ही दिन बाद उनके कार्यकाल में जारी कार्य-विभाजन आदेश को शासन ने निरस्त कर दिया। 3 सितंबर को जारी आदेश में विभाग के अपर संचालक, संयुक्त संचालक, उप संचालक और सहायक संचालक स्तर के अधिकारियों की जिम्मेदारियां बदली गई थीं। 9 सितंबर को शासन ने इस आदेश को पलट दिया।
मामला इसलिए गंभीर है क्योंकि विभाग के दो अधिकारियों—ऊषा सिंह सोलंकी और राजेश प्रताप सिंह—ने आदेश के अधिकार क्षेत्र पर सवाल उठाते हुए सचिव को पत्र लिखा था। उनका कहना था कि वे वन सेवा से जुड़े अधिकारी हैं और उनकी जिम्मेदारियों में बदलाव का अधिकार शासन स्तर पर है। इसके बाद सरकार ने पूरे मामले की समीक्षा की और पुरानी जिम्मेदारियां बहाल हो गईं।
निधि निवेदिता कोई अनजान नाम नहीं हैं। 2020 में राजगढ़ कलेक्टर रहते हुए एक पुलिसकर्मी को थप्पड़ मारने की घटना के बाद वे राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आई थीं। बाद में उनके प्रशासनिक कार्यकाल और वरिष्ठ अधिकारियों से तालमेल को लेकर भी विवाद सामने आते रहे हैं। हाल में सरकार ने उनके विभाग में बदलाव किया था।
अब असली सवाल यह है कि यदि आयुक्त स्तर पर जारी आदेश अधिकार क्षेत्र से बाहर था तो वह आदेश जारी ही कैसे हुआ? और अगर आयुक्त को कार्य-विभाजन का अधिकार था, तो शासन ने उसे तत्काल निरस्त क्यों किया?
सरकार को सिर्फ आदेश पलटने से आगे बढ़कर यह स्पष्ट करना चाहिए कि गलती कहां हुई—अधिकारी की तरफ से या शासन की प्रशासनिक व्यवस्था में। क्योंकि सवाल एक आईएएस अधिकारी का नहीं, उस पूरी व्यवस्था का है जहां आदेश जारी होते हैं, अधिकारी आपत्ति करते हैं और फिर सरकार को अपने ही तंत्र के फैसले वापस लेने पड़ते हैं।
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