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नई ट्रैवल थेरेपी: जहां नेटवर्क नहीं, वहां सुकून है

मोबाइल का सिग्नल गया तो बेचैनी क्यों? शायद इसलिए कि खुद से संपर्क टूट चुका है


संपादकीय | प्रणव बजाज



हम उस दौर में पहुंच गए हैं जहां आदमी पहाड़ देखने जाता है, लेकिन पहाड़ से पहले मोबाइल का नेटवर्क तलाशता है। नदी किनारे बैठता है तो पानी की आवाज सुनने के बजाय यह देखता है कि फोटो कितने लोगों ने देखी। परिवार के साथ यात्रा करता है, लेकिन हर कुछ मिनट में स्क्रीन पर लौट आता है। सवाल यह नहीं कि मोबाइल हमारे साथ है या नहीं, सवाल यह है कि हम मोबाइल के साथ कितना समय जी रहे हैं।


इसी डिजिटल बेचैनी के बीच अब यात्रा का एक नया विचार सामने आया है—डिजिटल डिटॉक्स। यानी ऐसी जगह कुछ दिन बिताना जहां इंटरनेट कमजोर हो, फोन लगातार नोटिफिकेशन न बजाए और सोशल मीडिया की दुनिया कुछ समय के लिए हमसे दूर हो जाए।


हिमाचल की तीर्थन घाटी और स्पीति, अरुणाचल की जीरो घाटी, उत्तराखंड का चोपता और किन्नौर का चितकुल जैसे इलाके इस लिहाज से यात्रियों को अलग अनुभव दे सकते हैं। कई हिस्सों में मोबाइल संपर्क सीमित हो सकता है, हालांकि नेटवर्क की स्थिति मौसम, स्थान और सेवा प्रदाता के अनुसार बदलती रहती है।


लेकिन असली डिजिटल डिटॉक्स किसी पहाड़ पर पहुंचने से शुरू नहीं होता। वह तब शुरू होता है जब हम तय करते हैं कि कुछ घंटों तक फोन हमारे जीवन का केंद्र नहीं रहेगा।


विडंबना देखिए—हम दुनिया के हर कोने से जुड़े हैं, लेकिन घर में बैठे व्यक्ति से बातचीत के लिए समय नहीं है। हजारों लोगों की पोस्ट देख लेते हैं, लेकिन सामने बैठे अपने इंसान की आंखों में झांकने का वक्त नहीं। हर खबर तुरंत चाहिए, हर संदेश का जवाब तुरंत चाहिए, हर तस्वीर साझा करनी है—लेकिन खुद के भीतर क्या चल रहा है, यह जानने की फुर्सत नहीं।


इसलिए अगली बार यात्रा की योजना बनाएं तो सिर्फ होटल, टिकट और लोकेशन न तलाशें। ऐसी जगह भी तलाशिए जहां आपका फोन कुछ समय के लिए चुप हो जाए।


क्योंकि जिंदगी में हर जगह नेटवर्क होना जरूरी नहीं।


कभी-कभी मोबाइल का सिग्नल खोना ही खुद से दोबारा जुड़ने का सबसे अच्छा सिग्नल होता है।

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