सड़क से बोर्ड हटाने के बाद अब ‘वेस्ट-टू-वेल्थ’ का खेल
प्रणव बजाज
इंदौर। शहर में आयोजनों, संस्थानों और प्रचार-प्रसार के लिए लाखों-करोड़ों रुपये खर्च कर लगाए जाने वाले फ्लेक्स और बैनर कुछ समय बाद नगर निगम की कार्रवाई में सड़क और सार्वजनिक स्थानों से हटा दिए जाते हैं। अब इन हटाए गए फ्लेक्स-बैनरों को नगर निगम कचरा मानकर फेंकने के बजाय प्रोसेसिंग यूनिट में भेजकर उससे दोबारा उपयोगी सामग्री तैयार कर रहा है। सवाल यह है कि जिस प्रचार सामग्री पर किसी संस्था या आयोजक ने पैसा खर्च किया, उसे हटाने के बाद उससे बनने वाले आर्थिक मूल्य का लाभ किसे मिल रहा है
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महापौर पुष्यमित्र भार्गव और निगमायुक्त क्षितिज सिंघल के निर्देश पर शुरू की गई फ्लेक्स-बैनर वेस्ट प्रोसेसिंग यूनिट की क्षमता करीब एक टन प्रतिदिन बताई गई है। मशीन में फ्लेक्स और बैनर की प्रोसेसिंग के बाद लगभग 50 प्रतिशत पीवीसी तथा 50 प्रतिशत कॉटन फाइबर अलग होता है। पीवीसी पुनर्चक्रण के लिए दिल्ली भेजा जा रहा है, जबकि कॉटन फाइबर से इंदौर में रस्सियां बनाई जा रही हैं।
यानी सड़क से हटाया गया फ्लेक्स अब केवल कचरा नहीं रह गया। उसकी सामग्री का उपयोग और संभावित आर्थिक मूल्य दोनों पैदा हो रहे हैं। निगम इसे पर्यावरण संरक्षण और ‘वेस्ट-टू-वेल्थ’ की पहल बता रहा है।
लेकिन इसके साथ कुछ सवाल भी खड़े होते हैं। क्या हटाए गए प्रत्येक फ्लेक्स-बैनर का रिकॉर्ड रखा जा रहा है? कितनी सामग्री प्रतिदिन यूनिट में पहुंचती है? उससे कितनी पीवीसी और कॉटन निकलता है? पीवीसी बेचने से कितनी राशि मिलती है? रस्सियों से कितनी आय होती है? और इस पूरी प्रक्रिया से नगर निगम को सालाना कितनी कमाई या बचत होगी?
शहर में प्रचार के लिए पैसा खर्च करने वाले आयोजकों और संस्थाओं के लिए भी यह व्यवस्था पारदर्शी होना जरूरी है। यदि निगम सड़क से हटाई गई सामग्री से आर्थिक लाभ अर्जित कर रहा है, तो संग्रहण से लेकर प्रोसेसिंग और बिक्री तक पूरा हिसाब सार्वजनिक होना चाहिए।
कचरे को कमाई में बदलना अच्छी पहल हो सकती है, लेकिन उसकी सफलता का पैमाना केवल मशीन चलना नहीं, बल्कि कितना कचरा आया, कितना संसाधन बना और उससे कितनी वास्तविक आय हुई—इसका खुला हिसाब होना चाहिए।

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