कोविड-19 के दौरान देशभर में फंसे झारखंड के प्रवासी श्रमिकों ने राज्य की व्यवस्था के सामने सबसे बड़ी चुनौती खड़ी की थी। उस संकट के बाद सरकार ने प्रवासी श्रमिकों को केवल संकट के समय घर लौटाने के बजाय उनका डेटाबेस, पंजीयन, कौशल और लोकेशन ट्रैकिंग जैसी व्यवस्थाओं पर जोर देना शुरू किया है। सवाल अब यह है कि ये बदलाव जमीन पर कितने प्रभावी हैं।
कोरोना काल में झारखंड ने राज्य नियंत्रण कक्ष बनाकर प्रवासी मजदूरों का पंजीयन और सहायता शुरू की थी। नीति आयोग के एक केस स्टडी के मुताबिक, इस व्यवस्था के जरिए करीब 10.5 लाख प्रवासियों ने सहायता के लिए पंजीयन कराया था।
इसके बाद राज्य ने Safe and Responsible Migration Initiative (SRMI) शुरू किया। सरकार ने प्रवासी श्रमिकों का डेटाबेस तैयार करने और दूसरे राज्यों से समन्वय के जरिए उनके सामाजिक, आर्थिक और कानूनी अधिकार सुरक्षित करने की बात कही।
अब 2026 में सरकार का फोकस और आगे बढ़ा है। जून 2026 की समीक्षा बैठक में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि देश के किस राज्य में झारखंड के कितने श्रमिक काम कर रहे हैं और क्या काम कर रहे हैं, इसका अपडेटेड डेटा तीन महीने के भीतर पोर्टल पर तैयार किया जाए। प्रवासी श्रमिकों की लोकेशन मैपिंग के साथ नोएडा, हैदराबाद, चेन्नई, बेंगलुरु और मुंबई में प्रवासी सहायता केंद्र स्थापित करने की योजना भी बताई गई।
केंद्र के e-Shram आंकड़ों के अनुसार 14 जुलाई 2026 तक झारखंड के 98,68,987 असंगठित श्रमिक पंजीकृत थे। वहीं राज्य के श्रम विभाग के ‘श्रमाधान’ पोर्टल पर प्रवासी श्रमिक पंजीयन की सुविधा और असंगठित श्रमिकों के लिए मृत्यु/दुर्घटना सहायता जैसी योजनाएं उपलब्ध हैं।
यानी कोविड के बाद बदलाव कंट्रोल रूम से डेटाबेस और अब लोकेशन-मैपिंग व सहायता केंद्रों तक पहुंचा है। लेकिन असली सवाल यही है—क्या यह डेटा संकट के समय मजदूर तक तत्काल मदद पहुंचाने में बदल रहा है, और क्या प्रवासन मजबूरी के बजाय सुरक्षित रोजगार का विकल्प बन पा रहा है? यही सरकार की गंभीरता की वास्तविक कसौटी होगी।

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