मुगल साम्राज्य की आर्थिक ताकत का सबसे बड़ा आधार कृषि से मिलने वाला राजस्व था। अकबर के समय से भूमि की पैदावार और उसकी कीमत का आकलन कर किसानों से लगान वसूला जाता था। साम्राज्य के अलग-अलग इलाकों में कर व्यवस्था और वसूली के तरीके अलग हो सकते थे।
इसके अलावा व्यापारिक कर, सीमा शुल्क, बाजार शुल्क, खनिज संसाधनों से आय और जागीर व्यवस्था भी राजस्व के महत्वपूर्ण स्रोत थे। बंदरगाहों और प्रमुख व्यापारिक मार्गों से होने वाला व्यापार भी सरकारी आय बढ़ाता था।
मुगल दौर की अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा हिस्सा कृषि पर निर्भर था। इतिहासकारों के अनुसार, अकबर के शासनकाल में केंद्रीय राजस्व कई करोड़ रुपये के बराबर था, हालांकि उस समय की मुद्रा और आज की मुद्रा के बीच सीधी तुलना करना बेहद कठिन है।
‘एक दिन की कमाई’ का आंकड़ा इसी वार्षिक राजस्व को 365 दिनों से बांटकर निकाला गया अनुमान हो सकता है। इसे मुगल बादशाह की व्यक्तिगत कमाई समझना सही नहीं होगा, क्योंकि यह पूरे साम्राज्य द्वारा जुटाया गया राजस्व था, जिसमें प्रशासन, सेना, अधिकारियों और अन्य खर्च भी शामिल थे।
यानी मुगल शासकों की आर्थिक शक्ति केवल खजाने में जमा धन से नहीं, बल्कि विशाल कृषि व्यवस्था, व्यापार और कर प्रणाली से बनी थी।

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