संपादकीय | प्रणव बजाज
कभी राजनीति में भाषण लिखे जाते थे, अब शायद गालियां लिखी जाती हैं। पहले नेता जनता को बताते थे कि देश कैसे बदलेगा, अब मंच पर यह तय होता दिखाई देता है कि विरोधी को किस नए नाम से बुलाया जाए। लोकतंत्र बचा रहे या न रहे, लेकिन सोशल मीडिया की टाइमलाइन पर कंटेंट की कमी नहीं होनी चाहिए!
इंदौर में छात्रों के कार्यक्रम के मंच से प्रधानमंत्री की मिमिक्री को लेकर विवाद उठा। किसी नेता की मिमिक्री अपने आप में लोकतांत्रिक हास्य का हिस्सा हो सकती है। समस्या तब पैदा होती है जब राजनीतिक मंच पर हास्य और व्यक्तिगत अपमान के बीच की रेखा ही मिट जाए। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष—माइक हाथ में आते ही मर्यादा का माइक्रोफोन बंद नहीं होना चाहिए।
आज स्थिति यह है कि राजनीतिक विरोध अब विचारों की लड़ाई कम और शब्दों की कुश्ती ज्यादा बनता जा रहा है। एक पक्ष विरोधी को चोर कहता है, दूसरा जवाब में कुछ और कहता है। तीसरा दोनों के वीडियो काटकर सोशल मीडिया पर डाल देता है और चौथा एआई से ऐसा वीडियो बना देता है जिसमें नेता ने वह भी कह दिया होता है जो उसने कभी कहा ही नहीं!
वाह लोकतंत्र!
नीति पर बहस के लिए दस्तावेज चाहिए, लेकिन गाली के लिए सिर्फ मोबाइल चाहिए।
सोशल मीडिया के राजनीतिक आईटी सेल इस नई राजनीति के सबसे तेज खिलाड़ी बन चुके हैं। सुबह बयान आता है, दोपहर तक मीम बन जाता है, शाम तक वीडियो वायरल और रात तक हजारों लोग उसे सच मानकर लड़ रहे होते हैं। तथ्य बेचारा कोने में बैठकर सोचता रहता है—मेरी बारी कब आएगी?
विडंबना यह भी है कि हर दल मर्यादा की दुहाई तब देता है जब गाली उसके नेता को दी जाती है। अपने पक्ष के नेता पर वही शब्द पड़ें तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता याद आती है और विरोधी पर पड़ें तो लोकतंत्र की हत्या!
यही दोहरा मापदंड राजनीति को जहरीला बनाता है।
बिहार से लेकर दिल्ली तक राजनीतिक प्रदर्शनों में आपत्तिजनक नारे और पोस्टर सामने आने की खबरें आती हैं। किसी नेता के परिवार पर हमला हो, प्रधानमंत्री पर हो, विपक्ष के नेता पर हो या किसी महिला नेता पर—गाली को राजनीतिक हथियार बनाने से लोकतंत्र मजबूत नहीं होता। भीड़ की आवाज बड़ी हो सकती है, लेकिन वह अपने आप में तर्क नहीं बन जाती।
और अब एआई ने खेल और आसान कर दिया है। कल तक फोटोशॉप था, आज डीपफेक और जनरेटिव एआई है। कल किसी नेता के बयान का गलत अर्थ निकाला जाता था, आज उसके मुंह में पूरा बयान डाला जा सकता है। यानी भविष्य में शायद चुनाव प्रचार का नया नारा होगा—“जो कहा नहीं, वह भी दिखाएंगे!”
राजनीति में कटाक्ष रहना चाहिए, व्यंग्य रहना चाहिए, सत्ता से सवाल होने चाहिए और विपक्ष को सरकार की आलोचना का पूरा अधिकार होना चाहिए। लेकिन आलोचना और अपमान एक चीज नहीं हैं।
जनता को नेताओं से कविता नहीं चाहिए। उसे रोजगार, शिक्षा, सड़क, महंगाई, कानून-व्यवस्था, भ्रष्टाचार और विकास पर जवाब चाहिए।
मगर राजनीति का नया मनोरंजन उद्योग इन सवालों से बचने का शानदार तरीका खोज चुका है—मुद्दे कठिन हों तो व्यक्ति पर हमला करो।
इसलिए सवाल किसी एक पार्टी से नहीं है।
सवाल उन सभी से है जो मंच पर मर्यादा भूल जाते हैं, उन सभी आईटी सेल से है जो नफरत को कंटेंट बनाते हैं और उन सभी समर्थकों से भी है जो अपने नेता की हर गाली को राष्ट्रहित और विरोधी की हर बात को देशद्रोह समझने लगते हैं।
क्योंकि लोकतंत्र में सबसे खतरनाक बात यह नहीं कि नेता एक-दूसरे पर चिल्ला रहे हैं।
सबसे खतरनाक बात यह है कि जनता भी अब उनकी भाषा में एक-दूसरे से लड़ने लगी है।
राजनीति में प्रतिद्वंद्वी को हराइए, विचार को हराइए, चुनाव में वोट मांगिए—लेकिन भाषा को इतना मत गिराइए कि अगली पीढ़ी लोकतंत्र को बहस नहीं, गाली की प्रतियोगिता समझने लगे।
आखिर संसद और सड़क के बीच फर्क इतना तो बचा रहना चाहिए कि दोनों जगह माइक होने के बावजूद भाषा अलग सुनाई दे।

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