उज्जैन में कानून-व्यवस्था पर सवाल ?
उज्जैन। धार्मिक नगरी उज्जैन में एक खास मेहमान के स्वागत के दौरान कथित तौर पर खुलेआम गोलियां चलाए जाने की घटना ने कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। बताया जा रहा है कि दुबई से आए शेख का स्वागत सोहराबुद्दीन के घर किया जा रहा था और इसी दौरान फायरिंग की गई।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर सार्वजनिक इलाके में हथियार लहराकर गोलियां चलाना संभव है, तो पुलिस की निगरानी व्यवस्था आखिर कहां थी? क्या कार्यक्रम की जानकारी पुलिस को थी? यदि थी तो हथियारों की जांच क्यों नहीं हुई? और यदि नहीं थी, तो शहर में इस तरह का आयोजन पुलिस की नजर से कैसे निकल गया?
उज्जैन कोई सामान्य शहर नहीं है। यहां महाकाल मंदिर के कारण देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु आते हैं और सिंहस्थ-2028 की तैयारियां भी चल रही हैं। ऐसे समय में खुलेआम फायरिंग की खबर सामने आना प्रशासन के लिए मामूली मामला नहीं हो सकता।
स्वागत के नाम पर गोली चलाना अगर कानून तोड़ने की श्रेणी में आता है तो कार्रवाई भी उतनी ही सख्त होनी चाहिए। किसी की पहचान, रसूख या मेहमान की हैसियत कानून से ऊपर नहीं हो सकती।
अब प्रशासन को सिर्फ यह बताना पर्याप्त नहीं होगा कि घटना में कितनी गोलियां चलीं। जनता जानना चाहती है—हथियार किसके थे, फायरिंग किसने की, लाइसेंस था या नहीं, पुलिस को इसकी जानकारी थी या नहीं और कार्रवाई कितनी हुई?
उज्जैन में यदि कानून का डर खत्म हुआ तो सिंहस्थ की तैयारियों पर करोड़ों रुपये खर्च करने का क्या मतलब?
सड़क, कॉरिडोर और सौंदर्यीकरण से शहर नहीं सुरक्षित होता। शहर तब सुरक्षित होता है, जब कानून तोड़ने वाले को यह भरोसा न हो कि वह खुलेआम गोली चलाकर भी बच जाएगा।
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