नई दिल्ली। हिमालय में तेजी से पिघलते ग्लेशियर अब केवल पर्यावरण का संकट नहीं रह गए हैं। इसका सीधा असर भारत की पानी, खेती, बिजली और अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। नई रिपोर्ट Prosperous and Resilient Himalayas ने चेतावनी दी है कि हिमालय के ग्लेशियर जिस गति से सिकुड़ रहे हैं, उससे आने वाले दशकों में नदियों के जलप्रवाह में गिरावट शुरू हो सकती है। रिपोर्ट के मुताबिक ग्लेशियरों का द्रव्यमान खोने की गति एक दशक पहले की तुलना में करीब 65% तेज हो चुकी है।
सबसे बड़ा खतरा गंगा और यमुना जैसी नदियों पर निर्भर करोड़ों लोगों के सामने है। हिमालयी क्षेत्र के करीब 200 ग्लेशियल झीलों को उच्च जोखिम वाली श्रेणी में रखा गया है, जिनमें भारत की 56 झीलें बेहद उच्च जोखिम वाली बताई गई हैं। इन झीलों के टूटने पर अचानक बाढ़ और भूस्खलन का खतरा बढ़ सकता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि हिमालय मध्य-शताब्दी तक ‘पीक वाटर’ की स्थिति में पहुंच सकता है—यानी एक समय के बाद ग्लेशियरों से नदियों में आने वाला पानी बढ़ने के बजाय घटने लगेगा। इसका असर पेयजल से लेकर सिंचाई और जलविद्युत उत्पादन तक दिखाई देगा।
सबसे गंभीर आर्थिक चेतावनी यह है कि हिमालय भारत की अर्थव्यवस्था के 20% से अधिक हिस्से को आधार देता है। मौजूदा भारतीय GDP को आधार मानें तो यह जोखिम दहाई लाख करोड़ रुपये की अर्थव्यवस्था से जुड़ता है। इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं कि हिमालय बचेगा या नहीं—सवाल यह है कि हिमालय का पानी घटा तो उत्तर भारत की अर्थव्यवस्था कितने समय तक टिक पाएगी?

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