विशेष रिपोर्ट | प्रणव बजाज
नई दिल्ली। दीपावली की रोशनी से पहले देश के बिजली तंत्र के सामने कोयले का संकट चिंता बढ़ा रहा है। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) के 19 सितंबर तक के आंकड़ों के मुताबिक देश के 190 थर्मल पावर प्लांट्स में से 74 प्लांट्स में कोयले का स्टॉक क्रिटिकल स्तर पर पहुंच गया है। यानी करीब 40 प्रतिशत संयंत्र या तो निर्धारित स्टॉक के 25 प्रतिशत से भी कम पर चल रहे हैं या उनके पास तीन दिन से कम उत्पादन का ईंधन बचा है। एक सप्ताह पहले ऐसे प्लांट्स की संख्या करीब 60 थी।
स्थिति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सितंबर में सामान्य तौर पर बिजली की मांग कुछ नरम पड़ने की उम्मीद रहती है, लेकिन इस बार गर्म मौसम ने मांग को ऊंचा बनाए रखा है। पिछले सप्ताह देश की पीक बिजली मांग 230 से 250 गीगावाट के बीच रही, जबकि मई में यह रिकॉर्ड 270.70 गीगावाट तक पहुंच चुकी है।
कोयले का कुल स्टॉक भी दबाव में है। 19 सितंबर को थर्मल प्लांट्स के पास करीब 22.9 मिलियन टन कोयला था, जो निर्धारित मानक स्टॉक का लगभग 39 प्रतिशत है। अगस्त के अंत से इसमें करीब 24 प्रतिशत गिरावट दर्ज की गई।
गर्मी, बारिश और रेल सप्लाई की मार
संकट को केवल “कोयले की कमी” कहना पूरी तस्वीर नहीं है। क्रिसिल के विश्लेषकों के अनुसार मौजूदा गिरावट मुख्यतः लॉजिस्टिक्स और परिवहन संबंधी अस्थायी समस्या हो सकती है। पूर्वी कोयला उत्पादक क्षेत्रों में बारिश से खनन, लोडिंग और रेल परिवहन प्रभावित हुआ। सरकार ने सितंबर की शुरुआत में सप्लाई बढ़ाने के कदम उठाए और पावर सेक्टर के लिए रेल रेक लोडिंग एक सप्ताह में 370 से बढ़ाकर 444 रेक की गई।
दूसरी तरफ बिजली की बढ़ती जरूरत ने दबाव और बढ़ाया है। अप्रैल-अगस्त के दौरान नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन करीब 21 प्रतिशत बढ़ा, लेकिन सौर और पवन ऊर्जा की उपलब्धता लगातार समान नहीं रहती। इसलिए चौबीसों घंटे बिजली आपूर्ति के लिए कोयला आधारित संयंत्रों पर निर्भरता बनी हुई है।
महंगा आयात भी बढ़ा
घरेलू आपूर्ति और खपत के बीच अंतर का असर आयात पर भी दिखाई दिया। अगस्त में बिजली क्षेत्र का कोयला आयात 5.52 मिलियन टन पहुंच गया, जो 15 महीने का उच्चतम स्तर और पिछले साल की तुलना में 85.6 प्रतिशत अधिक था। इसमें करीब 80 प्रतिशत कोयला इंडोनेशिया से आया। गर्मी के कारण मांग बढ़ने और जलविद्युत उत्पादन घटने से बिजली कंपनियों को विदेशी कोयले पर ज्यादा निर्भर होना पड़ा।
फिलहाल सरकारी स्तर पर इसे संरचनात्मक कोयला संकट के बजाय सप्लाई-चेन की चुनौती माना जा रहा है। लेकिन त्योहारों के दौरान यदि बिजली की मांग फिर तेज होती है, तो असली परीक्षा यह होगी कि रेल रेक, घरेलू कोयला और आयातित ईंधन समय पर थर्मल प्लांट्स तक पहुंचता है या नहीं। दीपावली की रोशनी से पहले यही सवाल बिजली व्यवस्था के सामने सबसे बड़ा है।

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