EOW जांच में बड़ा खुलासा: 16 मामलों में लोन मंजूरी से पहले ही तैयार थे पूर्णता प्रमाण पत्र, बंधक जमीन पर भी दोबारा ₹1.90 करोड़ का ऋण
इंदौर। खेत में पॉलीहाउस का नामोनिशान नहीं, लेकिन सरकारी योजना के दस्तावेजों में निर्माण पूरा। किसानों की जमीन के कागज बैंक तक पहुंचे, उनके नाम पर करोड़ों के ऋण मंजूर हुए और रकम निजी संस्थाओं तक पहुंच गई। आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (EOW) की जांच में राष्ट्रीय बागवानी मिशन से जुड़े ऐसे ही कथित फर्जीवाड़े का खुलासा हुआ है, जिसमें बैंक को ₹9 करोड़ 70 लाख 85 हजार की आर्थिक क्षति पहुंचाने का आरोप है।
जांच के अनुसार 33 किसानों के नाम पर ₹7 करोड़ 80 लाख 85 हजार के ऋण प्रकरण तैयार किए गए। इनमें कई पॉलीहाउस जमीन पर बने ही नहीं, फिर भी निर्माण पूर्णता प्रमाण पत्र के आधार पर भुगतान करा दिया गया। सबसे गंभीर तथ्य यह सामने आया कि 16 प्रकरणों में ऋण स्वीकृत होने से पहले ही पॉलीहाउस निर्माण पूरा होने के प्रमाण पत्र तैयार हो चुके थे। EOW ने इन्हें प्रथम दृष्टया कूटरचित माना है।
जांच में मेसर्स किसान एग्रो के 20, एवीआई एग्रीकल्चर सॉल्यूशन के पांच और सिरांश टेक्नो इंडिया के आठ पॉलीहाउस से जुड़े प्रकरण सामने आए। आरोप है कि कई मामलों में निर्माण किए बिना ही भुगतान प्राप्त किया गया।
मामले में एक और गंभीर गड़बड़ी सामने आई। EOW के मुताबिक नारायण सिंह की करीब एक हेक्टेयर जमीन पहले से बैंक में बंधक थी। इसके बावजूद उसी जमीन को दोबारा बंधक रखकर 7 दिसंबर 2015 को ₹1.90 करोड़ का कैश क्रेडिट ऋण स्वीकृत किया गया।
EOW ने निजी फर्मों के संचालकों, भागीदारों और तत्कालीन बैंक अधिकारियों समेत कई लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की है। अब जांच का बड़ा सवाल है—किसानों के नाम पर निकली रकम आखिर किन खातों में गई और बैंक की जांच व्यवस्था ने कागजों पर बने पॉलीहाउस को जमीन पर देखने की जरूरत क्यों नहीं समझी?

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