विशेष रिपोर्ट | प्रणव बजाज
भोपाल। मध्यप्रदेश टेक्स्ट बुक कॉरपोरेशन (एमपीटीबीसी) की वित्तीय व्यवस्था पर वित्तीय वर्ष 2024-25 की ऑडिट रिपोर्ट ने ऐसे सवाल खड़े किए हैं, जिनका जवाब सिर्फ हिसाब-किताब में नहीं, बल्कि पूरी प्रबंधन व्यवस्था में तलाशना होगा। रिपोर्ट के अनुसार राज्य शिक्षा केंद्र और लोक शिक्षण संचालनालय को मुफ्त अध्ययन सामग्री की सप्लाई के बदले निगम की 300.18 करोड़ रुपए की राशि लंबे समय से बकाया है। भुगतान अटकने से निगम की कार्यशील पूंजी प्रभावित होने और ब्याज से होने वाली संभावित आय के नुकसान का मुद्दा भी सामने आया है।
सवाल सिर्फ बकाया रकम का नहीं है। निगम के विभिन्न भंडारों में 1,02,900 से अधिक किताबें अनुपयोगी, पुरानी या बेकार मिलीं। इनका अनुमानित शुद्ध मूल्य करीब 57.68 लाख रुपए बताया गया है। वर्षों तक स्टॉक में पड़ी इन किताबों के कारण गोदाम, रखरखाव, बिजली और अन्य खर्च भी उठाने पड़े। ऑडिट ने अप्रत्यक्ष रूप से मांग के आकलन और स्टॉक प्रबंधन पर सवाल खड़ा किया है।
वहीं कर्मचारियों से नकद, स्टॉक और मूल्यवान सामग्री की जिम्मेदारी दिए जाने के बावजूद नियमों के मुताबिक सुरक्षा जमा नहीं लेने की आपत्ति भी दर्ज है। वेतन, आय-व्यय, कटौती, पीएफ, संपत्ति रजिस्टर, कैशबुक, बैंक स्टेटमेंट और भुगतान वाउचर जैसे महत्वपूर्ण रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं कराए जाने का उल्लेख भी रिपोर्ट में है।
सबसे अहम सवाल स्टोरों से जुड़े हिसाब पर है। 2024-25 में करीब 109.12 करोड़ रुपए संभागीय स्टोरों को दिए गए, जबकि पिछले वर्षों की 24.17 करोड़ रुपए राशि भी शेष थी। 31 मार्च 2025 तक कुल 35.07 करोड़ रुपए का समायोजन लंबित था।
ऑडिट के ये आंकड़े पूछते हैं—जब मुफ्त किताबों की सप्लाई पर करोड़ों फंस रहे थे, तब वसूली और वित्तीय निगरानी कितनी प्रभावी थी? और महत्वपूर्ण रिकॉर्ड उपलब्ध न होने की स्थिति में जवाबदेही आखिर किसकी तय होगी?

Post a Comment