चालान में नए खुलासे के बाद जांच पर उठे सवाल—क्या पुलिस सिर्फ एक शिकायत तक सीमित रही या रसूखदारों तक पहुंचने से बचती रही?
प्रणव बजाज
इंदौर। मध्यप्रदेश के बहुचर्चित हनी ट्रैप मामले के दूसरे अध्याय में अब जांच की दिशा से ज्यादा जांच की सीमाओं पर सवाल उठने लगे हैं। ताजा चालान और जांच से जुड़े सामने आए विवरणों के अनुसार पुलिस ने आरोपियों से 16 इलेक्ट्रॉनिक उपकरण जब्त किए हैं। इनमें मोबाइल फोन के अलावा पेन ड्राइव, स्पाई कैमरे और अन्य डिजिटल उपकरण शामिल बताए गए हैं।
इन उपकरणों की फोरेंसिक जांच सबसे महत्वपूर्ण कड़ी बन गई है। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार जांच के लिए दो-दो टीबी क्षमता वाले स्टोरेज उपकरणों का इस्तेमाल किया गया और डिजिटल सामग्री की संभावित मात्रा को लेकर 5 लाख से अधिक फोटो और 500 घंटे से ज्यादा वीडियो के बराबर डेटा होने की बात सामने आई है। हालांकि इन आंकड़ों को अंतिम रूप से फोरेंसिक जांच के निष्कर्षों से ही प्रमाणित माना जा सकेगा।
28 अप्रैल की घटना, 18 मई को एफआईआर—20 दिन का सवाल
मामले में एक बड़ा सवाल घटनाक्रम की समय-सीमा को लेकर भी है। रिपोर्ट के अनुसार शिकायतकर्ता चिंटू ठाकुर ने 28 अप्रैल की घटना का उल्लेख किया था, जबकि प्रकरण में एफआईआर 18 मई को दर्ज हुई। यानी घटना और औपचारिक प्राथमिकी के बीच करीब 20 दिन का अंतर रहा।
यही अंतर अब जांच की निष्पक्षता और कार्रवाई की गति को लेकर सवाल पैदा कर रहा है। आखिर इतने संवेदनशील मामले में शिकायत, सत्यापन और एफआईआर दर्ज होने के बीच क्या-क्या हुआ? क्या पुलिस शुरुआती स्तर पर मामले की पड़ताल कर रही थी या किसी अन्य कारण से कार्रवाई में देरी हुई? इन सवालों का स्पष्ट जवाब जांच एजेंसियों को देना होगा।
पहले आवेदन में श्वेता का नाम नहीं, बाद में कैसे जुड़ा?
रिपोर्ट के अनुसार 18 मई को दर्ज एफआईआर में शुरुआत में श्वेता विजय जैन का नाम नहीं था। बाद में शिकायतकर्ता के औपचारिक बयान में उनका नाम सामने आया। शिकायतकर्ता का कथित कहना था कि घटना के समय आरोपियों ने श्वेता का नाम लिया था और प्रारंभिक आवेदन में उनका नाम शामिल होना छूट गया था। इसके बाद पुलिस ने श्वेता को भोपाल से गिरफ्तार किया।
यहीं से जांच का एक और महत्वपूर्ण सवाल खड़ा होता है—क्या शुरुआती शिकायत की पर्याप्त जांच हुई थी और क्या सभी संभावित आरोपियों की भूमिका पहले दिन से जांच के दायरे में थी?
फोरेंसिक जांच तय करेगी असली कहानी
पुलिस ने डिजिटल उपकरणों की जांच के लिए फोरेंसिक विशेषज्ञों को कई महत्वपूर्ण बिंदु सौंपे हैं। इनमें कथित रूप से यह पता लगाना शामिल है कि—
क्या उपकरणों में आपत्तिजनक या यौन प्रकृति की तस्वीरें और वीडियो मौजूद हैं?
क्या किसी तस्वीर या वीडियो को कृत्रिम बुद्धिमत्ता अथवा डीपफेक तकनीक से बदला गया?
क्या सामग्री किसी अन्य व्यक्ति को भेजी या साझा की गई?
क्या चैट, ऑडियो या वीडियो में ब्लैकमेलिंग अथवा वसूली के प्रमाण हैं?
क्या सामाजिक माध्यमों और संदेश मंचों का उपयोग कथित अपराध के लिए किया गया?
यानी असली तस्वीर अभी फोरेंसिक रिपोर्ट के बाद ही साफ होगी।
सबसे बड़ा सवाल—क्या सिर्फ एक पीड़ित की जांच हुई?
चालान से जुड़ी रिपोर्टों में यह सवाल भी उठाया गया है कि कथित रूप से रसूखदार लोगों से जुड़े अन्य संभावित फोटो या वीडियो की चर्चा के बावजूद जांच में उनके बयान क्यों नहीं लिए गए। यदि डिजिटल सामग्री में अन्य लोगों से संबंधित कोई आपत्तिजनक रिकॉर्ड मिलता है, तो क्या पुलिस उनकी पहचान करेगी? क्या उनसे संपर्क किया जाएगा? और क्या नए पीड़ित सामने आने पर अलग प्रकरण दर्ज होंगे?
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 2019 के चर्चित हनी ट्रैप मामले में भी डिजिटल सामग्री, कथित ब्लैकमेलिंग और प्रभावशाली लोगों के नामों को लेकर बड़ा राजनीतिक और प्रशासनिक विवाद खड़ा हुआ था। उस मामले की जांच में एसआईटी ने कई आरोपियों से पूछताछ की थी।
‘हनी ट्रैप-2’ में अब असली परीक्षा
इंदौर का यह मामला अब केवल एक व्यक्ति की शिकायत और कुछ गिरफ्तारियों तक सीमित नहीं रह सकता। 16 डिजिटल उपकरणों की फोरेंसिक जांच इस पूरे मामले की दिशा बदल सकती है।
यदि इनमें केवल इसी शिकायत से जुड़े साक्ष्य मिलते हैं तो जांच एक दिशा में आगे बढ़ेगी। लेकिन यदि बड़ी संख्या में अन्य व्यक्तियों से जुड़े फोटो, वीडियो, बातचीत या कथित ब्लैकमेलिंग के प्रमाण मिलते हैं, तो सवाल कहीं बड़ा होगा—
क्या इंदौर पुलिस पूरी डिजिटल परत खोलेगी या जांच फिर कुछ नामों तक सीमित रह जाएगी?
**बौद्धिक प्रतिकार की पड़ताल जारी रहेगी।**

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