एक ही नेटवर्क से जुड़ी फर्मों ने दिखाई आपसी प्रतिस्पर्धा, ईओडब्ल्यू ने रणधीर पटेल समेत चार आरोपियों पर दर्ज की एफआईआर; विभागीय अधिकारियों की भूमिका भी जांच के घेरे में
भोपाल। मध्य प्रदेश के सामाजिक न्याय एवं दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग में करीब 10.99 करोड़ रुपये की कंप्यूटर, प्रिंटर और यूपीएस खरीदी अब बड़े कथित टेंडर फर्जीवाड़े के रूप में आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ की जांच के घेरे में आ गई है। ईओडब्ल्यू ने जांच के बाद रणधीर कुमार पटेल, हेमलता पटेल, अशोक कुमार सिंह और देवेंद्र सिंह समेत अन्य के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है।
जांच का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि सरकारी खरीद के लिए बनाए गए जेम पोर्टल पर प्रतिस्पर्धा दिखाने वाली फर्मों के बीच कथित तौर पर एक ही नेटवर्क का संबंध सामने आया। जांच में साईबाबा इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम, शांति ट्रेडर्स, एचटीएम इंडिया और सूरज इंटरप्राइजेज के बीच आपसी संबंधों की पड़ताल की जा रही है। आरोप है कि अलग-अलग फर्मों के जरिए बोली लगाकर वास्तविक प्रतिस्पर्धा का आभास पैदा किया गया और इसी आधार पर टेंडर हासिल किया गया।
एक ही पता, मोबाइल और ई-मेल?
ईओडब्ल्यू की जांच में कुछ फर्मों के पते, मोबाइल नंबर और ई-मेल विवरण में समानता मिलने की बात सामने आई है। जांच एजेंसी यह पता लगा रही है कि क्या इन फर्मों का इस्तेमाल केवल टेंडर प्रक्रिया में प्रतिस्पर्धा दिखाने के लिए किया गया था।
आरोप है कि मुख्य आरोपी से जुड़ी एक फर्म को टेंडर दिलाने के लिए दूसरी फर्मों के माध्यम से कथित तौर पर बोली की औपचारिक प्रतिस्पर्धा तैयार की गई। यही बिंदु अब इस पूरे मामले की जांच का सबसे महत्वपूर्ण आधार बन गया है।
3,754 का यूपीएस, 11,247 में सप्लाई का आरोप
खरीदी गई सामग्री की कीमतों को लेकर भी गंभीर सवाल उठे हैं। जांच से जुड़ी रिपोर्टों के अनुसार करीब 3,754 रुपये कीमत वाला यूपीएस विभाग को 11,247 रुपये में सप्लाई किए जाने का आरोप है। उसके बाजार मूल्य और विभाग को चुकाई गई कीमत के अंतर की भी जांच की जा रही है।
आरोप केवल महंगी खरीदी तक सीमित नहीं हैं। जांच में यह भी सामने आया है कि कुछ उपकरणों की सप्लाई और इंस्टॉलेशन टेंडर प्रक्रिया से पहले ही हो चुकी थी। पुराने या निर्धारित मानकों से अलग सामान की सप्लाई किए जाने के आरोपों की भी पड़ताल की जा रही है।
असली कंपनी के नाम पर लोकल पार्ट्स?
ईओडब्ल्यू के सामने यह आरोप भी जांच का विषय है कि ब्रांडेड उपकरणों के नाम पर स्थानीय अथवा मानकों से अलग पार्ट्स लगाए गए। यदि यह आरोप जांच में सही पाया जाता है तो मामला सिर्फ टेंडर में फर्जी प्रतिस्पर्धा तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सरकारी खरीदी में गुणवत्ता और तकनीकी सत्यापन की पूरी व्यवस्था सवालों के घेरे में आ जाएगी।
अब विभाग के अधिकारी भी जांच के घेरे में
सबसे बड़ा सवाल यह है कि करोड़ों रुपये की खरीदी में कथित अनियमितताएं आखिर विभाग की जांच और तकनीकी सत्यापन प्रक्रिया से कैसे गुजर गईं?
ईओडब्ल्यू अब सामाजिक न्याय विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों की संभावित भूमिका और मिलीभगत की भी जांच कर रहा है। जांच एजेंसी के अनुसार प्रकरण अभी खुला हुआ है और दस्तावेजों, भुगतान, तकनीकी सत्यापन तथा टेंडर प्रक्रिया की आगे जांच की जा रही है। जांच में नए तथ्य सामने आने पर अन्य लोगों की भूमिका भी तय हो सकती है।
एफआईआर के बाद मुख्य आरोपी से जुड़ी साईबाबा इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम को काली सूची में डालने की सिफारिश किए जाने की बात भी सामने आई है।
बड़ा सवाल
जेम पोर्टल पारदर्शी सरकारी खरीद के लिए बनाया गया था। लेकिन अगर एक ही नेटवर्क से जुड़ी फर्में आपस में मुकाबला दिखाकर करोड़ों का टेंडर हासिल कर लें, तो फिर सरकारी खरीद की निगरानी व्यवस्था कहां थी?
अब ईओडब्ल्यू की जांच बताएगी—10.99 करोड़ की इस खरीदी में असली खेल सिर्फ चार आरोपियों तक सीमित था या विभाग के भीतर भी कोई मजबूत संरक्षण तंत्र काम कर रहा था?

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