नई दिल्ली। कर्ज के भारी बोझ से जूझ रही सरकारी दूरसंचार कंपनी एमटीएनएल के लिए मॉरीशस से बाहर निकलने की योजना फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दी गई है। सरकार ने अपनी हिस्सेदारी बेचकर धन जुटाने के बजाय हिंद महासागर के इस रणनीतिक द्वीप पर भारत की मौजूदगी बनाए रखने को प्राथमिकता दी है।
एमटीएनएल के बोर्ड ने अगस्त 2024 में मॉरीशस स्थित अपनी इकाई महानगर टेलीफोन मॉरीशस लिमिटेड (एमटीएमएल) में हिस्सेदारी बेचने को मंजूरी दी थी। इसका मकसद गैर-मुख्य संपत्तियों का मौद्रीकरण कर कंपनी की वित्तीय देनदारियां कम करना था। लेकिन अब विदेश मंत्रालय की रणनीतिक चिंताओं के कारण इस फैसले पर रोक लगी है। अधिकारियों के अनुसार मॉरीशस में भारतीय कंपनी की मौजूदगी को भू-राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
दिलचस्प बात यह है कि एमटीएमएल खुद कर्ज में नहीं है और अपने खर्च तथा पूंजीगत जरूरतें आंतरिक संसाधनों से पूरी करती है। वित्त वर्ष 2025-26 में इसकी आय करीब 79 करोड़ रुपये रही, जबकि घाटा बढ़कर लगभग 6.5 करोड़ रुपये हो गया। कंपनी के पास चार लाख से अधिक ग्राहक हैं और वहां 5जी सेवाओं की दिशा में भी आगे बढ़ा जा रहा है।
दूसरी ओर, एमटीएनएल की कुल देनदारियां जून 2026 तक करीब 37,223 करोड़ रुपये पहुंच चुकी थीं। ऐसे में सवाल यह है कि क्या रणनीतिक हितों के लिए घाटे वाली विदेशी इकाई को बनाए रखना ज्यादा महत्वपूर्ण है, या उसकी हिस्सेदारी बेचकर कर्ज का बोझ घटाना? सरकार के सामने अब वित्तीय मजबूरी और रणनीतिक हितों के बीच संतुलन बनाने की चुनौती है।
मॉरीशस हिंद महासागर में भारत के लिए अहम साझेदार है। ऐसे में एमटीएनएल की मौजूदगी को सिर्फ कारोबार नहीं, बल्कि भारत की व्यापक क्षेत्रीय रणनीति के हिस्से के रूप में देखा जा रहा है।

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