ई-सिगरेट और वैपिंग को कई युवा सामान्य सिगरेट से कम नुकसानदेह मानते हैं। लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक इसे सुरक्षित विकल्प मानना सही नहीं है। ई-सिगरेट के एरोसोल में निकोटीन के अलावा कई रसायन और अन्य पदार्थ हो सकते हैं, जो फेफड़ों और श्वसन तंत्र को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
सिगरेट के धुएं में मौजूद कई ज्ञात कैंसरकारी रसायनों की तुलना में ई-सिगरेट के एरोसोल में कुछ हानिकारक पदार्थों का स्तर कम हो सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वैपिंग सुरक्षित है। इसके लंबे समय के प्रभावों पर अभी शोध जारी है।
विशेषज्ञों की चिंता खासतौर पर युवाओं को लेकर है। निकोटीन की लत लग सकती है और नियमित वैपिंग व्यक्ति को लंबे समय तक निकोटीन के संपर्क में रख सकती है। साथ ही, कुछ अध्ययनों में ई-सिगरेट के इस्तेमाल और फेफड़ों की कोशिकाओं में सूजन व क्षति के बीच संबंध सामने आया है।
क्या ई-सिगरेट सीधे फेफड़ों का कैंसर करती है? इसका निश्चित जवाब अभी विज्ञान के पास नहीं है। कैंसर का जोखिम कितना बढ़ता है, यह बताने के लिए लंबे समय के और मजबूत अध्ययन जरूरी हैं। लेकिन इतना स्पष्ट है कि ई-सिगरेट को जोखिम-मुक्त मानना गलत है।
जो लोग धूम्रपान नहीं करते, उनके लिए वैपिंग शुरू करने का कोई स्वास्थ्य लाभ नहीं है। खासकर युवाओं को निकोटीन की लत से बचना सबसे महत्वपूर्ण है।
सीधी बात: सिगरेट हो या ई-सिगरेट, फेफड़ों के लिए सबसे सुरक्षित विकल्प इन दोनों से दूर रहना है।

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