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न्याय की कुर्सी पर सवाल, अब बहाने नहीं—जवाब चाहिए

संपादकीय | प्रणव बजाज



न्याय व्यवस्था पर भरोसा लोकतंत्र की सबसे महंगी पूंजी है। जनता अदालत में इसलिए जाती है क्योंकि उसे उम्मीद होती है कि वहां फैसला न पैसे से बदलेगा, न पहचान से और न ही पद की ताकत से। लेकिन जब किसी न्यायाधीश के सरकारी आवास से बड़ी मात्रा में जली हुई नकदी मिलने का मामला सामने आए और जांच समिति आरोपों को सही ठहरा दे, तो सवाल सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं रह जाता—पूरी व्यवस्था के आईने पर दाग दिखाई देने लगता है।


न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के मामले में संसद की जांच समिति ने तीनों आरोपों को प्रमाणित माना है। समिति ने नकदी की मौजूदगी के संबंध में संतोषजनक स्पष्टीकरण न मिलने, साक्ष्यों से जुड़ी गंभीर परिस्थितियों और उनके जवाबों को टालमटोल वाला पाए जाने की बात कही है। 


यहां सबसे असहज सवाल यह है कि न्याय की कुर्सी पर बैठने वाले से नैतिकता की उम्मीद भी क्या अब सबूतों की तरह तौली जाएगी?


मार्च 2025 में आग लगने के बाद नकदी मिलने का मामला सामने आया था। सर्वोच्च न्यायालय ने तत्कालीन घटनाक्रम पर आंतरिक जांच कराई और बाद में संसद की प्रक्रिया भी आगे बढ़ी। अगस्त 2025 में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने न्यायाधीश जांच अधिनियम, 1968 के तहत तीन सदस्यीय समिति गठित की। समिति ने मई 2026 में अपनी रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष को सौंप दी। 


यानी मामला अब किसी राजनीतिक मंच की अफवाह नहीं है। संस्थागत जांच अपने निष्कर्ष तक पहुंच चुकी है।


लेकिन व्यंग्य देखिए—जनता से कहा जाता है कि न्यायपालिका पर भरोसा रखिए, जबकि न्यायपालिका के भीतर किसी गंभीर नैतिक सवाल पर कार्रवाई की प्रक्रिया इतनी लंबी हो सकती है कि भरोसा खुद तारीख मांगने लगे!


न्यायाधीशों की स्वतंत्रता लोकतंत्र के लिए अनिवार्य है। मगर स्वतंत्रता का अर्थ जवाबदेही से आजादी नहीं हो सकता। जिस संस्था को सरकार, संसद और समाज के आचरण पर संविधान की कसौटी लगाने का अधिकार है, उसकी अपनी नैतिक कसौटी सबसे ऊंची होनी चाहिए।


यह मामला यह भी सिखाता है कि न्यायाधीश की गरिमा केवल उसके फैसलों से नहीं बनती। उसका सार्वजनिक और निजी आचरण भी उसी कुर्सी की प्रतिष्ठा का हिस्सा है।


अब संसद के सामने प्रक्रिया है और देश के सामने सवाल।


कार्रवाई हो तो कानून के मुताबिक हो।

सफाई का अधिकार मिले तो पूरा मिले।

लेकिन अगर गंभीर आरोप जांच में प्रमाणित हो चुके हैं, तो फाइलों की भूलभुलैया में जवाबदेही को दफन नहीं किया जाना चाहिए।


क्योंकि अदालत की इमारत पत्थर और सीमेंट से बनती है, लेकिन न्यायपालिका की प्रतिष्ठा केवल भरोसे से बनती है।


और भरोसा एक बार जल जाए तो उसे किसी सरकारी आवास की जली हुई नकदी की तरह उठाकर फिर से तिजोरी में नहीं रखा जा सकता।


**न्याय की कुर्सी ऊंची है—इसलिए उस पर बैठने वालों की नैतिक जिम्मेदारी उससे भी ऊंची होनी चाहिए।**

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