मुंबई। महाराष्ट्र की शिवसेना पर कब्जे और ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिह्न को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई अब बेहद अहम मोड़ पर पहुंच गई है। उद्धव ठाकरे गुट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दलील दी है कि दल-बदल को संवैधानिक संरक्षण देने वाली व्याख्या लोकतांत्रिक व्यवस्था और दलबदल विरोधी कानून की मूल भावना के खिलाफ होगी।
मामले की जड़ 2022 में हुए शिवसेना विभाजन तक जाती है। एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में विधायकों के अलग होने के बाद सत्ता परिवर्तन हुआ और बाद में चुनाव आयोग ने शिंदे गुट को शिवसेना का नाम तथा ‘धनुष-बाण’ चिह्न दिया। उद्धव ठाकरे गुट ने चुनाव आयोग के इस फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी।
अब सुनवाई में पार्टी के भीतर हुए घटनाक्रम, विधायकों के समर्थन और उनके दस्तावेजों की वैधता जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण हो गए हैं। ‘अपनों के तीन दस्तखत’ को लेकर उठ रहे सवाल इसी व्यापक कानूनी लड़ाई का हिस्सा हैं। हालांकि इन दस्तखतों के आधार पर अंतिम न्यायिक निष्कर्ष अभी सामने नहीं आया है।
मामला इसलिए भी राजनीतिक रूप से संवेदनशील है क्योंकि जून 2026 में उद्धव गुट के नौ में से छह लोकसभा सांसदों के शिंदे गुट में जाने की खबर सामने आई थी। इससे संसद में उद्धव गुट की ताकत काफी घट गई।
अब सर्वोच्च न्यायालय का फैसला सिर्फ नाम और चुनाव चिह्न का सवाल नहीं रहेगा। इससे यह भी तय होगा कि 2022 में शिवसेना के भीतर हुआ सत्ता संघर्ष संवैधानिक कसौटी पर कितना टिकता है।
**शिवसेना की असली लड़ाई अब सड़क पर नहीं, दस्तावेजों और संविधान की धाराओं में लड़ी जा रही है।**

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