युवा शक्ति बदलाव का माध्यम हो सकती है, लेकिन बदलाव की जादुई छड़ी नहीं।
प्रणव बजाज : सम्पादकीय
जेन-जी को लेकर देश में इन दिनों एक अजीब तरह का उत्साह दिखाई दे रहा है। कोई उसे क्रांतिकारी बता रहा है, कोई व्यवस्था बदलने वाला नायक, कोई उसे सत्ता की सबसे बड़ी चुनौती मान रहा है तो कोई उसके पीछे अपनी राजनीति चमकाने की कोशिश कर रहा है। सत्ता भी उसे समझाने में लगी है और विपक्ष भी उसे अपने पाले में लाने की कोशिश करता दिखाई देता है।
युवा पीढ़ी की आवाज सुनना लोकतंत्र की आवश्यकता है, लेकिन उसे भगवान बना देना लोकतंत्र के लिए उतना ही खतरनाक हो सकता है, जितना उसकी आवाज को दबा देना।
जेन-जी ने कई मुद्दों पर सवाल उठाए हैं। शिक्षा व्यवस्था, रोजगार, परीक्षा प्रणाली, पारदर्शिता और शासन की जवाबदेही जैसे विषयों पर युवाओं की बेचैनी वास्तविक है। यदि युवा सवाल पूछ रहे हैं तो सत्ता को उन सवालों का जवाब देना ही चाहिए। आंदोलन लोकतंत्र का हिस्सा है और असहमति लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, उसकी ताकत है।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण सवाल है—क्या केवल आंदोलन कर देना व्यवस्था बदलने के लिए पर्याप्त है?
जवाब है—नहीं।
भारत का सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक ढांचा बेहद जटिल है। यह व्यवस्था दशकों में बनी है। इसमें औपनिवेशिक दौर की संस्थाएं हैं, स्वतंत्र भारत की नीतियां हैं, राजनीति के हित हैं, सामाजिक असमानताएं हैं, आर्थिक दबाव हैं और करोड़ों लोगों की अलग-अलग अपेक्षाएं हैं। इसे किसी एक आंदोलन, एक नारे या एक पीढ़ी के उत्साह से रातोंरात नहीं बदला जा सकता।
युवा पीढ़ी के उत्साह को सलाम कीजिए, लेकिन उसे भ्रम मत दीजिए कि उसके हाथ में कोई ऐसी जादुई छड़ी है जिसे घुमाते ही बेरोजगारी खत्म हो जाएगी, शिक्षा व्यवस्था सुधर जाएगी, भ्रष्टाचार समाप्त हो जाएगा और राजनीति रातोंरात ईमानदार हो जाएगी।
सवाल पूछना जरूरी है, जवाबदेही भी जरूरी है
सत्ता का अहंकार लोकतंत्र के लिए नुकसानदेह है। सरकारों को यह समझना होगा कि सोशल मीडिया के दौर में जनता की आवाज को नजरअंदाज करना आसान नहीं रहा। युवाओं के सवालों का जवाब देना सरकार की जिम्मेदारी है।
लेकिन युवाओं की भी जिम्मेदारी है कि वे केवल विरोध के लिए विरोध न करें। किसी व्यवस्था को बदलने के लिए केवल गुस्सा पर्याप्त नहीं होता। उसके लिए अध्ययन, संगठन, नीति, धैर्य और वैकल्पिक व्यवस्था की समझ भी चाहिए।
इतिहास में ऐसे कई आंदोलन हुए, जिन्होंने व्यवस्था बदलने का दावा किया। भ्रष्टाचार के खिलाफ भी बड़े आंदोलन हुए। जनता ने उन्हें समर्थन दिया। लेकिन सत्ता बदलने के बाद भी भ्रष्टाचार समाप्त नहीं हुआ। कई बार पुराने चेहरे हटे और नई व्यवस्था में वही पुराने रोग नए रूप में लौट आए।
इसलिए इतिहास का सबसे बड़ा सबक यही है—व्यक्ति बदलने से व्यवस्था नहीं बदलती, व्यवस्था बदलने के लिए संस्थाओं को मजबूत करना पड़ता है।
सोशल मीडिया की लोकप्रियता और वास्तविक बदलाव में फर्क
आज की पीढ़ी के पास अपनी बात रखने का अभूतपूर्व माध्यम है। कुछ सेकंड की वीडियो लाखों लोगों तक पहुंच सकती है। लाखों दर्शक मिल सकते हैं। किसी मुद्दे पर देशव्यापी बहस शुरू हो सकती है।
लेकिन दृश्यता और उपलब्धि में अंतर है।
लाखों बार देखी गई वीडियो नीति नहीं बनाती। लोकप्रिय नारा कानून नहीं बनाता। आक्रोश व्यवस्था का विकल्प नहीं बनता।
सामाजिक माध्यमों की लोकप्रियता युवा शक्ति को आवाज जरूर देती है, लेकिन वही लोकप्रियता कभी-कभी यह भ्रम भी पैदा कर सकती है कि आभासी समर्थन ही वास्तविक जनसमर्थन है।
यहीं सावधानी जरूरी है।
युवा नायक हैं, लेकिन अचूक नहीं
जेन-जी हमारे ही समाज की संतान है। यह वही पीढ़ी है जिसे हमने पाला है, जिसे हमने शिक्षा दी है और जिससे हमने भविष्य की उम्मीदें लगाई हैं। इसलिए उसके सवालों से डरने के बजाय उन्हें समझना चाहिए।
लेकिन अपने बच्चों को प्यार करने और उन्हें अचूक मान लेने में फर्क है।
युवा गलत भी हो सकते हैं। उनके निर्णय अधूरे भी हो सकते हैं। उनके आंदोलन में भावनात्मक उबाल भी हो सकता है। उनके बीच ऐसे लोग भी हो सकते हैं जो किसी राजनीतिक या आर्थिक हित से प्रभावित हों।
इसका अर्थ यह नहीं कि पूरी पीढ़ी को संदेह की नजर से देखा जाए। इसका अर्थ सिर्फ इतना है कि किसी भी पीढ़ी को आलोचना से ऊपर नहीं रखा जा सकता।
सत्ता भी समझे और विपक्ष भी
सत्ता को युवाओं को दुश्मन समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। वहीं विपक्ष को भी युवाओं के असंतोष को केवल सत्ता विरोधी हथियार बनाने से बचना चाहिए।
यदि युवा शिक्षा सुधार चाहते हैं तो उन्हें ठोस शिक्षा नीति पर बहस करनी चाहिए। यदि रोजगार चाहते हैं तो रोजगार सृजन की नीति पर सवाल होना चाहिए। यदि परीक्षा व्यवस्था में भ्रष्टाचार का आरोप है तो जांच, पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग होनी चाहिए।
यानी आंदोलन को नारे से नीति की ओर बढ़ना होगा।
जेन-जी को भगवान मत बनाइए
आज सबसे जरूरी बात यही है—जेन-जी को जेन-जी ही रहने दें।
उसे भगवान मत बनाइए। क्योंकि जिस दिन किसी पीढ़ी को भगवान बना दिया जाता है, उसी दिन उससे सवाल पूछना बंद हो जाता है। और जिस समाज में सवाल पूछना बंद हो जाए, वहां लोकतंत्र धीरे-धीरे कमजोर होने लगता है।
युवा पीढ़ी से सीखिए, उसके सवाल सुनिए, उसकी ऊर्जा का सम्मान कीजिए; लेकिन उसे विवेक, तर्क और जिम्मेदारी की कसौटी पर भी परखिए।
देश को न अंधभक्त युवा चाहिए, न अंधविरोधी युवा।
देश को चाहिए—सवाल पूछने वाला, तथ्य समझने वाला, इतिहास से सीखने वाला और भविष्य की जिम्मेदारी उठाने वाला युवा।
जेन-जी के पास बदलाव की ऊर्जा है। उसे दिशा देना समाज और सत्ता दोनों की जिम्मेदारी है।
किसी के पीछे भागकर भगवान खोजने की जरूरत नहीं।
अपने भीतर ईमानदारी, साहस, विवेक और जिम्मेदारी पैदा कीजिए।
तभी किसी काल्पनिक अवतार, किसी राजनीतिक मसीहा या किसी ‘जादुई छड़ी’ की जरूरत नहीं पड़ेगी।
जेन-जी को जेन-जी ही रहने दें—क्योंकि लोकतंत्र में नागरिक भगवान नहीं होते, नागरिक ही असली मालिक होते हैं।

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