अयोध्या का राम मंदिर लंबे समय से भारतीय जनता पार्टी की राजनीति का सबसे प्रभावशाली मुद्दा रहा है। मंदिर निर्माण को लेकर पार्टी ने उत्तर प्रदेश समेत देशभर में अपने राजनीतिक और सांस्कृतिक नैरेटिव को मजबूत किया। लेकिन अब उत्तर प्रदेश में विपक्ष इसी मुद्दे के इर्द-गिर्द नया राजनीतिक सवाल खड़ा करने की कोशिश कर रहा है।
विपक्ष ने ‘आस्था’ के साथ ‘पारदर्शिता’ को जोड़कर मंदिर से जुड़े विषयों पर सवाल उठाने की रणनीति अपनाई है। उसका प्रयास है कि धार्मिक भावनाओं से जुड़े मुद्दे को प्रशासनिक व्यवस्था, निर्माण कार्यों और उससे जुड़े निर्णयों की जवाबदेही के सवाल से जोड़ा जाए।
बीजेपी के लिए यह चुनौती इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि राम मंदिर का मुद्दा उसके सबसे मजबूत राजनीतिक आधारों में रहा है। विपक्ष यदि इसी मुद्दे पर सवाल खड़े करने में सफल होता है तो उत्तर प्रदेश में चुनावी नैरेटिव का एक हिस्सा बदल सकता है।
हालांकि, मंदिर से जुड़ी आस्था का राजनीतिक प्रभाव केवल आरोप-प्रत्यारोप से खत्म होना आसान नहीं है। बीजेपी के पास मंदिर निर्माण को लेकर लंबे संघर्ष और अयोध्या में हुए विकास कार्यों का अपना राजनीतिक पक्ष है। ऐसे में आने वाले समय में दोनों पक्षों की रणनीति इस बात पर निर्भर करेगी कि जनता के सामने कौन-सा नैरेटिव अधिक प्रभावी ढंग से पहुंचता है।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में अब सवाल सिर्फ राम मंदिर का नहीं, बल्कि यह भी है कि मंदिर की आस्था को पारदर्शिता और जवाबदेही के सवाल से जोड़कर विपक्ष कितना बड़ा राजनीतिक असर पैदा कर पाता है।

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