नई दिल्ली। रक्षाबंधन की पहचान भले ही भाई की कलाई पर बंधने वाले रक्षा सूत्र से हो, लेकिन समय के साथ राखी का रूप तेजी से बदल गया है। कभी साधारण सूती या रेशमी धागे से बनी राखी आज मोती, रुद्राक्ष, चांदी, कुंदन और व्यक्तिगत नामों वाली डिजाइन से लेकर कलाई पर पहनने वाले ब्रेसलेट के रूप में बाजार में दिखाई दे रही है।
परंपरागत रूप में राखी का महत्व उसकी सजावट से ज्यादा उसके भाव में रहा है। भारतीय संस्कृति में इसे भाई-बहन के स्नेह, शुभकामना और रक्षा के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।
बदलते दौर में पहले रंगीन धागों और छोटी सजावट ने जगह बनाई। इसके बाद मोती, चमकीले पत्थर, धार्मिक प्रतीक और रुद्राक्ष जैसी चीजें राखी का हिस्सा बनीं। बच्चों के लिए कार्टून पात्रों और खिलौना आधारित राखियां लोकप्रिय हुईं। अब युवाओं के बीच ऐसी राखियां भी पसंद की जा रही हैं जो देखने में कलाई-बैंड या आभूषण जैसी लगती हैं।
2026 में व्यक्तिगत डिजाइन और हस्तनिर्मित राखियों का चलन भी दिखाई दे रहा है। बाजार में नाम या खास संदेश वाली राखियां, चांदी से बनी राखियां और पर्यावरण के अनुकूल हस्तनिर्मित विकल्प चर्चा में हैं।
दिलचस्प बात यह है कि डिजाइन जितनी आधुनिक होती जा रही है, राखी का मूल भाव उतना ही पुराना है। धागा हो या ब्रेसलेट—कलाई पर बंधते ही वह भाई-बहन के रिश्ते, विश्वास और शुभकामना का प्रतीक बन जाता है।
यानी राखी बदली है, उसका अंदाज बदला है, लेकिन रिश्ते की डोर आज भी वही है।

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