बदलता मानसून, बढ़ता संकट: क्या हम नई जलवायु के लिए तैयार हैं?

 

संपादकीय | प्रणव बजाज


भारत में मानसून हमेशा से अनिश्चित रहा है। कभी कम बारिश, कभी अतिवृष्टि और कभी लंबे अंतराल के बाद अचानक मूसलाधार बारिश—यह सब भारतीय मौसम की पहचान का हिस्सा रहा है। लेकिन अब सवाल केवल अनिश्चितता का नहीं है। सवाल यह है कि क्या भारतीय मानसून अपनी पुरानी प्रकृति ही बदल रहा है?



इस साल के मानसून ने एक बार फिर इस सवाल को गंभीर बना दिया है। एक ओर सामान्य से कम बारिश के अनुमान लगाए जा रहे थे, दूसरी ओर कई राज्यों में कुछ ही घंटों में इतनी बारिश हुई कि नदियां उफान पर आ गईं, शहरों में पानी भर गया, सड़कें बह गईं और पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन तथा अचानक बाढ़ ने जनजीवन को संकट में डाल दिया।


गुजरात से असम और हिमाचल प्रदेश से केरल तक अलग-अलग रूपों में सामने आया यह संकट एक ही बात की ओर संकेत करता है—बारिश का पानी अब केवल मौसम नहीं, बल्कि आपदा प्रबंधन की परीक्षा बनता जा रहा है।


बारिश कम हो सकती है, लेकिन संकट ज्यादा क्यों?


मानसून को केवल कुल वर्षा के आंकड़े से समझना अब पर्याप्त नहीं है।


मान लीजिए किसी क्षेत्र में पूरे मानसून में औसत बारिश सामान्य रही। लेकिन यदि वही बारिश 90 दिनों के बजाय कुछ ही दिनों में अत्यधिक मात्रा में हो जाए, तो उसके परिणाम बिल्कुल अलग होंगे।


कृषि के लिए बारिश का सही समय जरूरी है।


जलाशयों के लिए बारिश का क्रम जरूरी है।


भूजल के पुनर्भरण के लिए बारिश का फैलाव जरूरी है।


शहरों के लिए जल निकासी की क्षमता जरूरी है।


लेकिन यदि कई दिनों की बारिश कुछ घंटों में गिर जाए तो जमीन उसे सोख नहीं पाती, नालियां और नदियां उसका दबाव नहीं संभाल पातीं और पहाड़ों पर ढलान अस्थिर होने लगती है।


यही वह बदलाव है जिसे अब गंभीरता से समझने की जरूरत है।


एक तरफ बाढ़, दूसरी तरफ सूखा


मानसून की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि एक ही देश में एक क्षेत्र पानी में डूबता है और दूसरा पानी के लिए तरसता है।


झारखंड में बारिश की कमी ने खरीफ फसलों की बुआई और रोपाई को प्रभावित किया है। धान जैसी पानी पर निर्भर फसलों पर इसका सीधा असर पड़ सकता है।


दूसरी ओर असम, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, केरल, कर्नाटक और ओडिशा जैसे राज्यों में अत्यधिक बारिश और बाढ़ ने अलग तरह का संकट पैदा किया है।


यह विरोधाभास बताता है कि भविष्य की चुनौती केवल “कम बारिश या ज्यादा बारिश” नहीं होगी।


चुनौती होगी—बारिश का असमान वितरण और उसका बढ़ता चरम रूप।


बादल फटना अब केवल पहाड़ों की समस्या नहीं


बादल फटने और अचानक बाढ़ की घटनाओं ने हिमालयी राज्यों को लंबे समय से परेशान किया है। लेकिन अब ऐसी घटनाओं को केवल प्राकृतिक आपदा कहकर आगे बढ़ जाना पर्याप्त नहीं है।


पहाड़ों में सड़क निर्माण, सुरंगें, अनियंत्रित निर्माण, नदी घाटियों में खनन और वन क्षेत्र में बदलाव जैसे मानवीय हस्तक्षेप भी जोखिम बढ़ा सकते हैं।


नदी की प्राकृतिक धारा और उसके बाढ़ क्षेत्र को यदि निर्माण से लगातार संकुचित किया जाएगा, तो अत्यधिक बारिश की स्थिति में पानी के पास निकलने का रास्ता कम होता जाएगा।


यही कारण है कि जलवायु परिवर्तन और गलत विकास मॉडल को अलग-अलग करके देखना खतरनाक भूल होगी।


जलवायु परिवर्तन बारिश को अधिक चरम बना सकता है, लेकिन उस बारिश को आपदा में बदलने का काम हमारी अव्यवस्थित योजना भी कर सकती है।


गर्म हवा ज्यादा नमी लेकर आ रही है


वैज्ञानिकों की चिंता का एक महत्वपूर्ण कारण वातावरण का बढ़ता तापमान है।


गर्म वातावरण अधिक जलवाष्प धारण कर सकता है। समुद्र का बढ़ता तापमान भी वातावरण में नमी की मात्रा को प्रभावित करता है। जब ऐसी नमी से भरे वातावरण में अनुकूल मौसम प्रणाली बनती है, तो कम समय में अत्यधिक बारिश हो सकती है।


इसीलिए आज सवाल यह नहीं रह गया है कि मानसून में कुल कितने मिलीमीटर पानी बरसेगा।


सवाल यह है—


वह पानी कितने दिनों में गिरेगा?


किस इलाके में गिरेगा?


कितनी तीव्रता से गिरेगा?


और सबसे महत्वपूर्ण—


क्या हमारे शहर, गांव, सड़कें, बांध और नदी तंत्र उस पानी को संभाल पाएंगे?


नदियों को हमने नाला समझ लिया


मानसून की तबाही का एक कारण केवल बादल नहीं हैं।


नदी घाटियों में अत्यधिक खनन, नदी के प्राकृतिक प्रवाह क्षेत्र में अतिक्रमण, बाढ़ क्षेत्र में निर्माण और नदियों में बढ़ती गाद भी संकट को बढ़ा सकती है।


जब नदी की जलधारण क्षमता घटती है तो सामान्य से अधिक पानी आने पर वह जल्दी अपने किनारों से बाहर निकलती है।


इसलिए बाढ़ नियंत्रण की नीति केवल बांध बनाने या नदी किनारे तटबंध खड़े करने तक सीमित नहीं रह सकती।


हमें यह भी देखना होगा कि नदी को हमने कितना स्थान छोड़ा है।


शहरों की असली परीक्षा


भारत के बड़े शहरों की योजना आज भी काफी हद तक पुराने मौसम के आंकड़ों पर आधारित है।

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