तीसरी मुंबई बसाने निकली सरकार, पहली मुंबई की बदहाली कौन संभालेगा?

 

परीक्षित गुप्ता : मुंबई

फडणवीस सरकार का बड़ा शहरी सपना, 324 वर्ग किमी में नया शहर; लेकिन मुंबई में पानी, सड़क, जाम और जलनिकासी अब भी चुनौती

मुंबई को संभालने की चुनौती खत्म नहीं हुई और महाराष्ट्र सरकार ने तीसरी मुंबई बसाने की तैयारी तेज कर दी है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की मौजूदगी में मुंबई महानगर प्रदेश विकास प्राधिकरण ने सिंगापुर की कंपनी सुरबाना जुरोंग के साथ मुंबई 3.0 के दृष्टि दस्तावेज और मास्टर प्लान की तैयारी का समझौता किया है। प्रस्तावित केएससी न्यू टाउन रायगढ़ जिले के उरण, पनवेल और पेण तहसीलों के 124 गांवों में करीब 323.44 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में विकसित किया जाएगा।


सरकार का दावा है कि यह क्षेत्र अटल सेतु, नवी मुंबई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे और विरार-अलीबाग बहु-मॉडल गलियारे जैसी बड़ी परियोजनाओं से जुड़कर भविष्य का आर्थिक केंद्र बनेगा। अप्रैल 2026 में MMRDA ने भूमि अधिग्रहण की भागीदारी आधारित नीति भी घोषित की थी, जिसमें पात्र भू-मालिकों को विकसित भूमि का 22.5 प्रतिशत लौटाने का प्रावधान बताया गया है।

असली सवाल: पहली मुंबई का क्या?

तीसरी मुंबई का सपना बड़ा है, लेकिन मुंबई महानगर की मौजूदा समस्याएं भी छोटी नहीं हैं। बारिश में जलभराव, सड़क और यातायात का दबाव, बढ़ती आबादी, आवास की समस्या और बुनियादी सेवाओं पर लगातार सवाल उठते रहे हैं।

सवाल मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से है—क्या नया शहर बनाना जरूरी है, या पहले मौजूदा महानगर की कमजोर व्यवस्था को दुरुस्त करना प्राथमिकता होनी चाहिए?

फाइल से मैदान तक जिम्मेदारी किसकी?

इस परियोजना की सबसे महत्वपूर्ण संस्था MMRDA है। इसके महानगर आयुक्त डॉ. संजय मुखर्जी, आईएएस हैं। आधिकारिक जानकारी के अनुसार वही MMRDA के प्रशासनिक नेतृत्व में हैं। उनके साथ संयुक्त महानगर आयुक्त पंकज देवरे, आईएएस भी जुलाई 2026 से प्राधिकरण में जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।

नीति स्तर पर MMRDA के अध्यक्ष महाराष्ट्र के नगर विकास मंत्री और उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे हैं। प्राधिकरण की कार्यकारिणी समिति की अध्यक्षता मुख्य सचिव राजेश अग्रवाल करते हैं। समिति में अतिरिक्त मुख्य सचिव असीमकुमार गुप्ता, मुंबई महानगरपालिका आयुक्त अश्विनी भिडे और सिडको के प्रबंध निदेशक अश्विन मुदगल जैसे वरिष्ठ अधिकारी शामिल हैं।

यानी यह सिर्फ एक शहर बनाने की योजना नहीं, बल्कि राजनीतिक नेतृत्व और वरिष्ठ नौकरशाही की संयुक्त जवाबदेही वाली परियोजना है।

अब जनता को यह भी जानना होगा कि हजारों करोड़ की प्रस्तावित व्यवस्था में जमीन, अधोसंरचना, परिवहन, पर्यावरण और पुनर्वास पर फैसले कैसे होंगे। क्योंकि शहर नक्शे पर नहीं, जमीन पर बनता है—और जमीन पर सबसे पहले सवाल आम नागरिक का होता है।

तीसरी मुंबई बनाने से पहले सरकार को पहली मुंबई के नागरिक से एक सवाल जरूर पूछना चाहिए—जिस शहर में आज भी सड़क, पानी, जलनिकासी और यातायात की समस्या पूरी तरह हल नहीं हुई, क्या उसके बगल में एक और महानगर खड़ा करना ही विकास का सबसे बड़ा मॉडल है?

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